गुरुवार, 19 अक्तूबर 2017

अविस्मरणीय रहेगा वह सूर्योदय... आजीवन...

[दक्षिण की यात्रा से लौटकर...(4)

होटल पहुँचकर, सद्यःस्नान-समापनांतर, हम सभी रात्रि-भोजन के लिए पास के एक भोजनालय में गये। अच्छे आहार से तृप्त होकर, उनींदी आँखें, थकान से बोझ बनी देह लिये जब होटल के शानदार, गुदगुदे और मुलायम बिस्तर पर गिरे तो बेहोशी की नींद आयी। पार्श्व में घहराते समुद्र की गर्जना भी निद्रा में बाधक न बन सकी। मुझे लगा, सुदूर दक्षिण के समुद्री-तट पर समुद्र अपेक्षया शांत और संयमित है, वैसा उद्विग्न, उच्छृंखल और आक्रामक नहीं, जैसा मुंबई, कोलकाता अथवा जगन्नाथपुरी के तटबंधों पर है--हाहाकारी! तभी स्मरण में कौंधा, यहीं कहीं प्रभु श्रीराम ने समुद्र का दर्प-मर्दन किया था और उसे संतुलित होकर मार्ग देने के लिए विवश किया था। मुझे याद आयीं कवि भूषण की पंक्तियाँ--

"बिना चतुरंग संग वनरन लै के बाँधि वारिधि को लंक रघुनन्दन जराई है/ पारथ अकेले द्रोन भीषम सों लाख भट, जीत लीन्हीं नगरी विराट में बड़ाई है/ भूषन भनत भट गुसलखाने में खुमान अबरंग साहिबी हथ्याय हरि लाई है/ तौ कहाँ अचम्भो महाराज सिवराज, सदा वीरन के हिम्मतै हथ्यार होत आई है।"

हाँ, तभी तो कन्याकुमारी के समुद्री कछार पर लहरें किंचित् मंथर गति से आती हैं और पद-प्रक्षालन कर लौट जाती हैं, किंतु रात्रिकाल में थोड़ी स्वतंत्रता लेकर मुदित होती हैं और इसी मोद में उनका रोर कुछ बढ़ जाता है। भूषण की उपर्युक्त पंक्तियों के स्मरण मात्र से पौराणिक पात्र आँखों के सामने प्रकट होने लगे। माता सीता के वियोग में विकल प्रभु राम वन लाँघते हुए इसी भूमि-भाग में कभी आये होंगे। श्रीराम-भक्त हनुमानजी ने यहीं कहीं से लगायी होगी लंबी छलाँग। समुद्र के सुस्थिर हो जाने पर वानर-सेना ने उस पर बाँधा होगा सेतु...! मस्तिष्क सोचने लगा, यहाँ से कितनी दूर होगा रामेश्वरम्! पूछने पर ज्ञात हुआ, बहुत दूर--प्रायः तीन सौ किलोमीटर! इस जानकारी ने मेरे अतिचिंतन पर विराम लगाया।...

होटल के कमरे की खिड़कियों से हमने बाह्य परिदृश्यों का अवलोकन किया, तस्वीरें उतारीं; फिर तो निद्राभिभूत आँखें स्वयं ही बंद होने लगीं। हम शय्याशायी हुए। निद्रा देवी ने तत्काल हमें अपने आगोश में ले लिया। हम बेसुध सो गये।...

सुबह 5 बजे ही श्रीमतीजी ने झकझोर कर जगाया। यह शरीर पर अत्याचार-सा ही था, लेकिन तेजोराशेजगत्पते दिवाकर के दर्शन के लिये, उनकी अगवानी के लिए हमें जागना ही था। समय से तैयार होकर होटल के चार कमरों से चारों परिवार निकलकर लाॅबी में एकत्रित हुए--मैं सपत्नीक, दामाद साहब सपरिवार और उनके दो मित्र अपने-अपने परिवारों के साथ। अब हमें सूर्योदय दर्शन के लिए उपयुक्त स्थान पर पहुँचना था। होटल के स्वागत काउंटर पर जो संभ्रांत, सुदर्शन युवक खड़े थे, उन्होंने अंग्रेजी में पूछा--'आपलोग कहाँ जायेंगे?' दामाद साहब ने कहा--'सनराइज देखने।' स्वागतकर्ता ने सलाह दी कि 'सनराइज देखने के लिए सर्वोत्तम स्थान तो होटल के सातवें माले की छत ही है। आपलोग वहीं चले जायँ।' लिफ्ट से पूरा कुनबा तत्क्षण भवन की छत पर पहुँचा। तब तक घनान्धकार ही था--सर्वत्र। भूमि-भाग पर आसपास के जितने भवन-मन्दिर थे, वे रौशनी से जगमगा रहे थे--जल के बीच बना 'स्वामी विवेकानन्द राॅक मेमोरियल' और तिरुवल्लुवरजी की विशालकाय मूर्ति! वहाँ तक ले जानेवाली बोट का लंगर और जेटी तथा सम्मुख था दृष्टि-सीमा के परे तक बहता अनन्त सागर। यह अद्भुत-अकल्पनीय और मनोहारी दृश्य था। हमारी टोली मंत्रमुग्ध, ठगी-सी खड़ी थी!

छत पर और भी कई लोग थे। सूर्यदेव का कहीं पता नहीं था। सभी अपने सेल और कैमरे से प्रकाश तथा अंधकार के मिश्रण को कैद कर रहे थे। हमने भी वही किया। 5.30 पर हम छत पर पहुँच गये थे। गूगल सर्च ने हमें बताया था 6.08 पर प्रकट होंगे सूर्यदेव! हमारी अधीरता बढ़ती जा रही थी और लगता था, पल ठहर गये हैं, खिसकते नहीं। लेकिन, यह हमारा भ्रम था--हमारी बेकली का असर था...क्षण को अतीत का ग्रास बन जाना ही था और बिना हमें सचेत किये वह बनता जा रहा था अतीत का निवाला...!

छह बजते ही क्षितिज का रंग बदलने लगा। अंधकार परास्त होता स्पष्ट दिखा। हम सचेत-सावधान हो गये। अपनी-अपनी धुरी पर जड़, स्थिर! पहले उदयाचल का रंग धूसर हुआ, फिर पीला और फिर टुह लाल--रक्तिम! इसी लालिमा में, सुदूर आकाश में बादल का एक त्रिकोण रक्ताभ हो उठा। ऐसा लगा, सूर्यदेव ने आगमन के पहले विजय पताका फहरायी है। अचानक रवि-रश्मियों ने क्षितिज से झाँकना शुरू किया, सर्वत्र गहरा पीला रंग पुत गया क्षितिज के छोर पर। और, तभी दिनकर प्रकट होते दिखे। मुझे राष्ट्रकवि दिनकर याद आये और याद आयी बालकवि बैरागी की पंक्ति, जो राष्ट्रकवि के निधन पर उन्होंने लिखी थी--
'क्या कहा कि दिनकर अस्त हो गया,
दक्षिण के दूर दिशांचल में?'

ऐसा प्रतीत हुआ, मानो अथाह समुद्र में एक गहरी डुबकी मारकर जगतपति दिनकर बाहर आ गये हैं अभी-अभी।... आत्मा सिहर उठी। लगने लगा, कवि दिनकर अपनी अनन्त काव्य-रश्मियों के साथ लौट आये हैं भारत की भूमि पर।... दिशाएं आलोकित होने लगीं। क़ायनात का गोशा-गोशा रौशन हो उठा और तभी सैलानियों का प्रसन्नता से भरा एक शोर उठा--तुमुल नाद-सा। सैलानी, जो देश-विदेश से आकर वहाँ एकत्रित थे और देव दिवाकर के प्रातःदर्शन से हर्षोन्मत्त हो उठे थे। सातवीं मंजिल की छत से हम उन्हें भी देख रहे थे और सुन पा रहे थे वह जन-कोलाहल। वह सूर्योदय-दर्शन अद्भुत, अविस्मरणीय है और रहेगा आजीवन...!






लेकिन, यह क्या? मैंने लक्ष्य किया कि सूर्योदय उसी पश्चिम दिशा से हुआ, जहाँ कल सायंकाल सूर्यास्त हुआ था--यहाँ से ठीक डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर ! तो क्या दक्षिण भारत में सूर्योदय और सूर्यास्त पश्चिम दिशा में होता है? परमाश्चर्य ! पूछने पर ज्ञात हुआ कि यही एकमात्र ऐसा स्थल है, जहाँ ऐसा विभ्रम होता है; लेकिन मेरी शंका का समूल समाधान नहीं हुआ। जो प्रत्यक्ष घटित हुआ था, उसे नकारता कैसे?

इन दिनों मेरी दोनों बेटियों ने आपस में कुछ मंत्रणा कर अपने माता-पिता को सुख पहुँचाने का निश्चय किया है शायद! पिछले दिनों छोटी बेटी संज्ञा ने सदी के महानायक श्रीअमिताभ बच्चन से मिलवाकर मेरा एक सपना सच किया था और अब बड़ी बेटी कल्याणीया शैली और दामाद आयु. रवि ने यह दुर्लभ दर्शन का असीम सुख दिया। उन दोनों को मेरा आशीर्वाद कि उन्होंने यह संयोग बनाया, निमित्त बने, अन्यथा मैं अपने कागज़ों के अंबार का दीमक ही बना रह जाता...!

--आनन्द.
02-10-2017.

रविवार, 15 अक्तूबर 2017

बादलों की ओट धरकर सूर्य ने ले ली जल-समाधि...

[दक्षिण की यात्रा से लौटकर--3]

त्रिवेंद्रम से कन्याकुमारी सौ किलोमीटर दूर है। 65-67 किलोमीटर का सफ़र करके हम महाराजाधिराज मार्तण्डवर्मा के राजप्रासाद पहुँचे थे, लेकिन निर्माणाधीन होने के कारण मुख्य मार्ग अवरुद्ध था। हमें राजमार्ग छोड़कर सँकरे, उच्चावच और उबड़-खाबड़ रास्तों से गुज़रना पड़ा, जो भयप्रद भी था। इसमें ख़ासा वक्त बर्बाद हुआ। फिर, राजमहल में हम ऐसे मग्न हुए कि समय का कुछ होश नहीं रहा। अब 33-35 किलोमीटर की दूरी तय करनी थी और हमें भूख भी लग आयी थी। पद्मनाभपुरम् से निकलते ही उडपी का शाकाहारी भोजनालय देखकर हम हर्षित हुए और जमकर वहीं बैठ गए। पेट-पूजा से निवृत्त होकर हम पुनः दौड़ चले कन्याकुमारी की ओर। सूर्यास्त के पहले कन्याकुमारी पहुँचकर और होटल से तरोताज़ा होकर हमें 'सनसेट प्वाइंट' जा पहुँचना था। ग़नीमत थी, अब सड़क अपेक्षया अच्छी थी। हमें दामाद साहब के कार-चालन-कौशल का बड़ा भरोसा भी था, वह द्रुत गति से हमें गन्तव्य की ओर ले चले। लेकिन कार के पहियों को आखिरकार 33-35 किलोमीटर की दूरी को तो नपना ही था और दिन था कि ढलने को अधीर हो रहा था।

मनोरम वन-वीथियों की अनुपम शोभा को निहारते हुए हम क्षिप्रता से चले जा रहे थे। वनों, छोटी-छोटी पहाड़ियों और नद-नदियों के बीच से गुज़रते हुए हम सभी अपूर्व सुख का अनुभव कर रहे थे। सच है, लंबी यात्रा से हम बेहद थक गये थे, क्लांत थे, लेकिन हमारी ऊर्जा, हमारे उत्साह में कमी नहीं थी। हमारे साथ-साथ दायें हाथ घोर गर्जना करता समुद्र दौड़ रहा था और हमारी नस-नाड़ियों में भर रहा था अतीव उछाह। अनूठी सुख-सृष्टि का प्रदेश है केरल-तमिलनाडु! लेकिन 35 किलोमीटर की दूरी तय करते-करते सूर्यास्त का समय लबे-दम हो आया। होटल जाकर तैयार होने का अवकाश न रहा। हमने होटल से डेढ़ किलोमीटर पहले ही कोवलम् के बीच (सनसेट प्वाइंट) पर पहुँचना सुनिश्चित किया। समुद्र के तट पर जा खड़ा होना सचमुच रोमांचक अनुभव था। सनसेट प्वाइंट पर सैलानियों की अपार भीड़ थी, कारों-बसों का लंबा काफ़िला था। अपनी कार को थोड़ी दूरी पर छोड़कर और पद-यात्रा कर हम एक ऊँची शिला पर स्थापित हुए और सूर्यास्त की प्रतीक्षा करने लगे।...

और, थोड़ी ही देर में सूर्य पश्चिमी क्षितिज पर उतर आया, लेकिन जिधर वह अस्त होने चला, वहीं आकाश की किसी अज्ञात अभियांत्रिकी से निकलता गहरे काले धुएँ-सा बादल घनीभूत होता दिखा। ओह, दिवाकर तो बादलों की ओट जा छिपा। कभी किसी कोण से वह झाँकता तो आकाश का नज़ारा बदल जाता, समुद्र के जल की लहराती चूनर धानी हो जाती। आसमान में रंगों की बारिश हो रही थी ... साथ-साथ हमारे मन का रंग भी 'बैनीआहपिनाला' हो रहा था। सभी मुदित मन थे। समुद्री हवाएँ हमारी केश-राशि से खेल रही थीं और हम उनके साथ झूम रहे थे। यही खेल खेलता सूर्य अस्ताचलगामी हुआ, बादलों की ओट धरकर। लेकिन, उस सांध्यकाल में जो कुछ हमने देखा, वह कन्याकुमारी के समुद्र-तट से ही देखना संभव था। सचमुच, वह अद्भुत दृश्य था--अनदेखा, अनजाना दृश्य! हम रोमांचित-पुलकित वहाँ से आगे बढ़े होटल की ओर!






'सी-व्यू' होटल यथानाम तथागुण था, बिल्कुल समुद्र के किनारे। हम पाँचवें माले के अपने कमरे में पहुँचे और कमरे की खिड़कियों तथा बाल्कनी से बाहर का दृश्य देखकर प्रायः चौंक पड़े। अथाह जल-राशि हमारे सामने तरंगित थी। लहरें शीघ्रता से आतीं और तट छूकर लौट जातीं। भारत के मानचित्र को ध्यान में रखते हुए मुझे ऐसी प्रतीति हुई कि मैं देश की पाद-भूमि में एक भवन की पाँचवीं मंजिल पर निपट अकेला खड़ा हूँ और साश्चर्य देख रहा हूँ, क्षिप्र गति से आती हर लहर को, जो आती है और मेरे देश का पाँव पखारकर चली जाती है। मैं निर्निमेष देखता ही रह जाता हूँ लहरों की यह चरण-वंदना! और, यह क्रिया अनवरत होती है--अविराम! अनुभूति का ऐसा रोमांच मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया था। सोचता ही रह जाता हूँ, यह वारिधि कैसा विलक्षण भक्त है, जो निरंतर भारत-भूमि के पाँव पखार रहा है, क्षण-भर का विश्राम भी इसे स्वीकार नहीं !...
(क्रमशः)
1-10-2017

[चित्र-परिचय  : 1) सूर्यास्त-दर्शन को दौड़ चले हम 2) शिलासीन हुआ मैं 3) दर्शनार्थियों और वाहनों की भीड़ 4) सूर्यदेव को ओट देने आये बादल 5) अलौकिक अभियांत्रिकी से निकलता बादलों का काला धुआँ 6) मैं सपरिवार।

रविवार, 8 अक्तूबर 2017

राजा के किले से विभव विलुप्त हुआ, लेकिन वहाँ पुराना वक्त ठहरा मिला...

[दक्षिण की यात्रा से लौटकर--2.]

त्रिवेंद्रम से कन्याकुमारी के मार्ग में राजा अनिझम थिरुनल मार्तण्डवर्मा का किला था। मुख्य मार्ग से एक वक्र मोड़ लेकर हम वहाँ पहुँचे। राजा के किले के मुख्यद्वार पर पहुँचे तो लगा ही नहीं कि किसी उल्लेखनीय राजद्वार पर आ गये हैं। वह तो हमें किसी समृद्ध गाँव के मुखिया का उन्नत दोमंज़िला मकान-सा प्रतीत हुआ--चौड़े लाल पत्थरों के खपरैलवाला भवन ! हम सभी आश्चर्यचकित थे--आखिरकार यह कैसा राजप्रासाद?

लेकिन मुख्यद्वार से प्रविष्ट होने के बाद पतली-सँकरी सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते हुए हम फिर चकित हुए बिना न रह सके। पत्थर के स्तम्भों पर लकड़ी के मोटे बर्गों और शहतीरों से कई-कई खण्डों में निर्मित था वह राजप्रासाद! प्रत्येक खण्ड की अलग विशेषता थी। उसे भवन न कहकर भवन-समूह कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। उसका परिसर विशाल है, यह प्रवेश के बाद ही जाना जा सकता है। काष्ठ-कला अद्भुत नमूना है यह!

प्रथम खण्ड में महाराजाधिराज का कोर्ट-रूम था, जहाँ अपने सभासदों के साथ सर्वोच्च आसन पर विराजमान होकर राजा मार्तण्डवर्मा अधिकारियों के साथ विमर्श करके न्याय करते थे। उस कक्ष की महराबें और काष्ठ पर उत्कीर्ण नक्काशियाँ अद्भुत और प्राचीनकाल की हैं, यह देखकर ही समझा जा सकता है। काष्ठ निर्मित सँकरी सीढ़ियाँ प्रथम तल से दूसरे और दूसरे से तीसरे माले पर ले जाती हैं। निर्माण में प्रयुक्त लकड़ियाँ आज भी यथावत् हैं अपनी पूरी चमक और आन-बान-शान के साथ।




तीन शताब्दी पहले दक्षिण के एक सर्वसमर्थ, शासन की धुरी, विस्तृत भू-भाग के एकछत्र स्वामी महाराजाधिराज क्या ऐसे भवन में निवास करते थे? यह सोचकर भी आश्चर्य होता है। 300 वर्ष पूर्व महाराज मार्तण्डवर्मा ने ही अपने प्रयत्नों से पद्मनाभस्वामी मंदिर का कायाकल्प किया था। तीन सौ वर्ष--उंगलियों पर गिनी जानेवाली तीन शताब्दियां, लेकिन इन तीन शताब्दियों में न जाने कितनी पीढ़ियाँ आयी-गयीं, जाने कितना-कुछ बदल गया भारत के इस भूमि-खण्ड पर!

मैने उत्तर भारत के अनेक राजप्रासादों को देखा है, मुगल-काल के अनेक बादशाहों के किले देखे हैं, किन्तु सुदूर दक्षिण के पद्मनाभपुरम् के मार्तण्डवर्मा के महल की सादगी और सुरुचि मुझे प्रभावित करती है और मुझे विस्मित भी करती है। धर्म में गहरी आस्था रखनेवाले और युगानुरूप आसन्न संकटों-अवरोधों से जूझनेवाले राजा मार्तण्डवर्मा ने अपने जीवनकाल में अद्भुत शौर्य और पराक्रम का परिचय दिया था। मात्र 53 वर्ष की जीवन-यात्रा में उन्होंने त्रावणकोर की बिखरी हुई रियासतों को एकीकृत किया, पद्मनाभस्वामी मंदिर के वैभव का विस्तार किया, डच सैन्य शक्ति का डटकर सामना किया और अनेक समुद्री युद्धों में उन्हें परास्त कर उनकी विस्तारवादी नीतियों पर विराम लगाया। दो प्रमुख सेना-नायकों और ग्यारह हज़ार डच सैनिकों को उन्होंने युद्धबंदी बनाया तथा उदयगिरि के बंदीगृह में डाल दिया। कालान्तर में राजा मार्तण्ड वर्मा ने दया दिखाते हुए युद्धबंदियों को इस शर्त पर रिहा कर दिया कि वे फिर कभी भारत-भूमि पर दिखाई न दें और उन्हें अपने सैन्य संरक्षण में कोलंबो तक भेजा, लेकिन दोनों सेना-नायकों को बंदीगृह में ही रहने दिया। बाद में थोड़ी नर्मी दिखाते हुए उन्होंने अपनी सेना को प्रशिक्षित करने का काम उन्हें सौंपा, जिसे वे दोनों आजीवन करते रहे।...

सोचता हूँ, दक्षिण भारत के ऐसे धर्मरक्षक, वीर सपूत, पद्मनाभस्वामी के चरण-सेवक मात्र 53 वर्षों के अपने छोटे-से जीवनकाल में इतने सारे महत्व के काम कैसे कर सके और वह भी अपने इस छोटे-से राजप्रासाद से? कैसे...? खेद की बात है कि धर्म की धुरी माने जानेवाले, देश की अस्मिता और गौरव के रक्षक, अखण्ड भारत की संप्रभुता के ध्वजवाहक राजा मार्तण्ड वर्मा की प्रेरक जीवन-कथा को एन.सी.ई.आर.टी. की पुस्तकों में कहीं स्थान न मिला।

मैं तो देख आया दर्शनार्थियों की भीड़ से भरा हुआ राजन् का राजमहल, जहाँ का वैभव विलुप्त हो चुका है, लेकिन समय ठिठका-सहमा-दुबका खड़ा है महल के हर कक्ष में, गलियारों में, सँकरी सीढ़ियों के नीचे, पूजा-गृह में, माता के कमरे में, राजा की शय्या के नीचे, अतिथि-भवन 'इन्द्र विलास' में, परकोटों पर--और छोटे-छोटे गवाक्षों से झाँकते हुए...! क्या आप इसे देखना न चाहेंगे...?

--आनन्द.
01-10-2017.

चित्र-परिचय  : 1) राज-प्रासाद का प्रवेश-द्वार, 2) महाराजाधिराज मार्तण्ड वर्मा 3) राजन की न्यायशाला,
4) प्रासाद के गलियारे में सपत्नीक, जब एक बाँकी किरण गृह-लक्ष्मी की हथेलियों पर आकर ठहर गयी।

गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

प्रभु पद्मनाभस्वामी के द्वार पहुँचा...

[दक्षिण की यात्रा से लौटकर--(१)]

शेषनाग की शय्या पर गहन निद्रा में मग्न भगवान् विष्णु के आठ एकड़ में बने पाँच हजार वर्ष पुराने मन्दिर में विजयादशमी की सुबह 7.40 पर अपने दल के साथ पहुँचा। साथ थीं श्रीमतीजी, बेटी-दामाद और हम सबके प्यारे ऋतज! कोची से ही सहयात्री बने दामाद साहब के एक मित्र भी सपरिवार हमारे साथ थे। त्रिवेंद्रम के एक मित्र भी सपरिवार हमारे दल में आ मिले। दरअसल, दुर्लभ दर्शन को सरल-सहज बनाने की सारी व्यवस्था उन्होंने ही की थी। मन्दिर में हमारा प्रवेश सहज हो गया। एक विशेष पुजारीजी धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते हुए हमारी जिज्ञासाओं का निराकरण करते रहे। ऋतज मुझे पण्डितजी के अंग्रेजी वक्तव्यों का हिन्दी-अनुवाद बता-बताकर बार-बार पूछते रहे--'नान् जी, आप समझ गए न?' उन्होंने मान लिया है कि मैं हिंदीदाँ हूँ और अंग्रेजी का ज्ञान मुझे बिल्कुल नहीं है।...

अति प्राचीन इस धर्म क्षेत्र को पृथ्वी पर साक्षात् वर्तमान प्रभु श्रीविष्णु के स्थान की मान्यता प्राप्त है। प्रस्तर के 365 विशालकाय स्तम्भों के चौरस गलियारों के मध्य भव्य मन्दिर है, शेषनाग की कोमल शय्या पर निद्रा-निमग्न हैं प्रभु। उनके नाभि-कमल के पुष्प-दल पर विराजमान हैं ब्रह्मा, बायें हस्त में कमल का फूल है और दायीं हथेली के नीचे स्वयं समक्ष हैं देवाधिदेव महादेव! गोपुरम् का शिल्प और उसकी भव्यता दर्शनीय है, मोहित करती है।
विजयादशमी के कारण आज पद्मनाभम् स्वामी के मन्दिर-परिसर में बहुत भीड़ थी। दर्शनार्थियों की कतार का न ओर दिखता था, न छोर। वस्त्राचार का नियम-बंधन भी बहुत है, जिसका कठोरता से पालन किया जाता है। प्रत्येक महिला के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है और प्रत्येक पुरुष के लिए मुण्डु (दक्षिण भारत का धोती-लुंगीनुमां परिधान) और तन पर मात्र अंगवस्त्रम्। दामाद साहब के मित्र की कृपा से जन-समुद्र से बचते हुए हम बड़ी आसानी से श्रीहरि के दिव्य दर्शन कर आये। हमने मूल मन्दिर की परिक्रमा की, फिर ध्यान कक्ष में जा बैठे।
ध्यान का मेरा अभ्यास पुराना है, लेकिन वह अभ्यास परा-विलास के ज़माने का था, जिसके किस्से आपने पहले ही पढ़े हैं और जिसे छोड़े हुए भी एक युग बीत गया है। उस युग के ध्यान के अनुभव किसी को न बताने की खास हिदायत थी। अमूमन उन अनुभवों को मैं किसी के साथ साझा करता भी नहीं था। लेकिन अब न कोई वर्जना है, न कोई अंकुश।...

आज पद्मनाभ मन्दिर के ध्यान प्रकोष्ठ में बैठा तो सिहरन-भरी विचित्र अनुभूति हुई। मन करता है कि यह अनुभव-अद्वितीय आप सबों के साथ बाँट लूँ। 15-20 मिनट ही एकाग्रचित्त होकर बैठा था कि मानस-पटल के मध्य हरे रंग की कोमल कली प्रकट होती प्रतीत हुई। किसी चलचित्र की तरह उस कली का विकास हुआ और धीरे-धीरे उसके खुलते दल रंग बदलने लगे। पाँच मिनट के निमिष काल में वह सुन्दर गुलाबी कमल पुष्प में परिणत हो गया। उसके आसपास अलौकिक आभा बिखरी हुई थी।... और हठात् ध्यान भंग हुआ। ध्यान की अवस्था में मिले इस अलौकिक अमूर्त दर्शन का अर्थ-अभिप्राय समझने के लिए फिर मैं ध्यान-मग्न होने की चेष्टा ही करता रह गया, ध्यान लगा नहीं।

मन्दिर से निकलकर हम होटल आये। कपड़े बदले। सुबह से उपवास था। हमने अल्पाहार लिया और बच्चों की ज़िद पर चिड़ियाघर-अजायबघर गये। फिर केले के हरे पात पर सद्याभोजन ग्रहण करने एक होटल में गये। यह केरल का विशिष्ट आयुर्वेदिक आहार है--जितना चाहिए, उतना मिलेगा। हमने छककर उदरपूर्ति की। उसके बाद बीस-एक किलोमीटर की यात्रा करके पहुँचे कोवलम् के समुद्र-तट पर। अरब सागर का अन्तरराष्ट्रीय व्यपार-मार्ग हमने पुलकित भाव से देखा। 'बीच' पर बच्चों ने जल-क्रीड़ा की, फिर हम लौट चले। रात नौ बजे के आसपास हम अपने रैनबसेरे में पहुँच गये।

ऐसी अलौकिक, उल्लासमयी विजयादशमी जीवन में कभी व्यतीत नहीं हुई थी..!
--आनन्द. /30-09-2017

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

'अन्वेषी आँखें'...'आत्मा की आँखें'...


[ राष्ट्रकवि दिनकरजी की 109वीं जयन्ती (23 सितम्बर) पर पुण्य-स्मरण.]

राष्ट्रकवि पूज्य दिनकरजी के कक्ष में, उनकी कृपा-छाया में, उनके दिशा-निर्देश में, उनके श्रीचरणों में बैठकर डेढ़ महीने तक सेवा-भावना से उन्हीं का काम करना अपूर्व सुखदायक था। वे डेढ़ महीने जीवन के अविस्मरणीय दिन थे। मैंने बहुत कुछ सीखा था उनसे, बहुत-से प्रसंग सुने और अनेक कविताएँ सुनी थीं उनके श्रीमुख से। उन्हीं दिनों का एक वाकया याद आता है।

अपने काॅलेज से छूटकर उस दिन (1-5-1972 ) भी मैं यथासमय दिनकरजी के घर पहुँच गया था, लेकिन किसी कारणवश मुझे बारह बजे तक लौट जाना था। यह बात मैंने उन्हें बतायी तो बोले--'हाँ-हाँ, जरूर जाओ। डेढ़-दो घण्टे में जितना हो सके, उतना ही काम करो।' फिर मैं काम में जुट गया। 'दिनकर की डायरी' की पाण्डुलिपि के जितने पृष्ठ लिखने संभव थे, मैंने बारह बजे तक लिखे। बारह बजते ही मैं जाने को उठ खड़ा हुआ। उस वक्त दिनकरजी स्नानघर में जाने के लिए अपने वस्त्र उठा रहे थे।

मैंने उनसे कहा--'चाचाजी! बारह बज गये, अब मैं जाता हूँ।'
उन्होंने स्वीकृति दी और मैंने लौट चलने को कदम बढ़ाये ही थे कि जाने उन्हें क्या सूझी, उन्होंने कहा--'ठहरो!'
मेरे बढ़ते कदम ठिठक गये। मैं पलटा और उनकी ओर मुखातिब हुआ। मैंने देखा, वह अपने हाथ में उठाया हुआ वस्त्र कुर्सी के हत्थे पर रखकर अलमारी में सजी किताबों के पास गये और एक पुस्तक निकाल लाये। वह उनकी काव्य-पुस्तिका 'आत्मा की आँखें' थी। अपनी कलम से उसकी जिल्द के बादवाले पृष्ठ पर उन्होंने कुछ लिखा और मुझे देते हुए बोले--'लो, इसे पढ़ना। यह 'मुक्त' के लिए नहीं, तुम्हारे लिए है।'


मैं उपकृत हुआ। पुस्तक को मैंने सिर से लगाया, अपने कंधे से लटकते बुद्धिजीवी झोले में रखा और वापस लौट चला। दिनकरजी के घर से लंबी पद-यात्रा करके मुख्य सड़क पर आना होता था, जहाँ से कोई वाहन मिलता था और वह मुझे मेरे घर पटनासिटी तक पहुँचा देता था। दिनकरजी के राजेन्द्र नगरवाले घर से निकलकर मैं क्षिप्रता से चलने लगा। अभी दो-तीन फर्लांग ही गया होऊँगा कि मन में यह जानने का लोभ उत्पन्न हुआ कि देखूँ, दिनकरजी ने पुस्तक पर आखिर लिखा क्या है? इस विचार के मन में उपजते ही मेरी गति शिथिल हुई। मैंने झोले से पुस्तक निकाली, जिल्द पलटकर दिनकरजी की लिखित पंक्ति पढ़ने लगा। उन्होंने लिखा था--

"चि. आनन्द वर्ध
के योग्य,
--दिनकर
1-5-1972."

'वर्धन' का अंतिम अक्षर 'न' लिखने से रह गया था। मुझे घर पहुँचने की जल्दबाजी थी, फिर भी मैं उलटे पाँव लौटा। दिनकरजी के घर पहुँचा तो पाया, वह स्नानागार में हैं। मैं उनके कक्ष में बैठकर प्रतीक्षा करने लगा। थोड़ी ही देर में वह बाहर आये और मुझे देखते ही बोल पड़े--'अरे, तुम लौट क्यों आये?'
मैंने संकुचित भाव से कहा--"एक 'न' छूट गया है, इसलिए!" वह अभिप्राय कुछ समझ न सके। उन्होंने फिर पूछा--'क्या कहा?'
अब और कुछ कहना मेरे लिए कठिन था। मैंने पुस्तक की जिल्द खोलकर उनके सामने कर दी, बोला कुछ नहीं। उन्होंने पृष्ठ पर दृष्टिपात न करके मुझसे कहा--'हाँ, यह पुस्तक मैंने दी है तुम्हें!'..

अपनी बात स्पष्टतः उनके सामने रखना बहुत कठिन प्रतीत हो रहा था मुझे ! अंततः पृष्ठ की ओर इंगित करते हए मैंने कहा--'आपने जो लिखा है, उसे पढ़िये।' वह अपने लिखे को पढ़ने लगे और हठात् ठहाका मारकर हँस पड़े। जब संयत हुए तो बोले--"एक अदद 'न' का ही तो सवाल था! इसे तो तुम कल भी लिखवा सकते थे मुझसे। दूर तक जाकर लौट आने की क्या आवश्यकता थी?"

उन्होंने कलम उठायी और यथास्थान 'न' लिखा दिया और पुस्तक मेरी ओर बढ़ाते हुए बोले--'अब इस उम्र में मुझसे ऐसी गफ़लत होने लगी है। पहले ऐसा न था।'

मैं चलने लगा तो दिनकरजी ने खड़े होकर मेरी पीठ थपथपाई और कहा--"लगता है, अशुद्धियों-कमियों को परास्त करने का यह विरल गुण तुमने मुक्तजी से ही ग्रहण किया है। उनके सुपुत्र की ऐसी ही 'अन्वेषी आँखें' होनी चाहिए।"...

तीन लघ्वाकार पंक्तियों में एकमात्र शब्द की छूट की औचक पकड़ में मैंने कोई भगीरथ प्रयत्न नहीं किया था। अतिउत्सुकता में राह चलते पुस्तक की जिल्द पलटी और तीनों पंक्तियाँ पढ़ डालीं। दूसरी पंक्ति में अपने नाम पर पहुँचते ही आँखें ठिठक गयी थीं। मैं उल्टे पाँव लौटा था। इसमें मेरी पात्रता अथवा महार्घता का प्रश्न ही कहाँ था, लेकिन विपथ हुए एक अदद 'न' को राह पर ले आने की ऐसी तत्परता की इतनी मुखर प्रशंसा, इस रूप में, राष्ट्रकवि दिनकरजी से ही मिल सकती थी। यह उनका अमोघ आशीर्वाद ही था, जिसे ग्रहण कर और विनयपूर्वक उन्हेंं प्रणाम कर मैंं प्रसन्नचित्त घर लौटा।...
--आनन्दवर्धन ओझा.

[चित्र : देश-पूज्य दिनकरजी और उनकी अमूल्य भेंट 'आत्मा की आँखें' की वह दुर्लभ प्रति, जो आज भी मेरे संग्रह की शोभा बढ़ा रही है।]

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

और, पिताजी चिल्लाये--'मिल गया, मिल गया!'...

उन दिनों पिताजी (पुण्यश्लोक पं. प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त') 'सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू' के नौवें या ग्यारहवें खण्ड का अनुवाद कर रहे थे। वे दिल्ली-प्रवास के दिन थे।... जवाहरलालजी की अंग्रेजी के क्या कहने! वह अंग्रेजों से अच्छी अंग्रेजी बोलते-लिखते थे--यह तो जगजाहिर है। एक पूरा अनुच्छेद अल्प विराम, अर्द्धविराम, कोलनों, डैशों-हाइफनों के सहारे रचा गया--मात्र एक वाक्य! हिन्दी-अनुवाद में उन सारगर्भित विशाल वाक्यों को तोड़कर छोटे-छोटे वाक्यों में रखना सचमुच श्रमसाध्य और दिमाग का दही बना देनेवाला कष्टकर कार्य था। उस पर तुर्रा यह कि 'नेहरू शांति प्रतिष्ठान' के मंत्री श्रीकर्ण सिंह ने पिताजी से कभी कहा था--"पण्डितजी, 'नेहरू वाड्.मय' तो अथाह समुद्र है। आप अनुवाद करते चलिये, आपकी अनुवाद-भाषा नेहरूजी की हिन्दुस्तानी के बहुत करीब है।" लिहाजा अनुवाद हिन्दी में नहीं, हिन्दुस्तानी भाषा में करना था।...

जब मैंने यह प्रकरण पिताजी से सुना तो पूछा उनसे--'हिन्दुस्तानी भाषा का क्या मतलब?' उन्होंने उदाहरण देते हुए मुझे समझाया था--"अब देश का भविष्य सुरक्षित है।' अगर यही वाक्य नेहरूजी को कहना होता तो वह कहते--'अब वतन का मुस्तक़बिल महफ़ूज़ है।" बात मेरी समझ में थोड़ी-बहुत पहले भी थी, अब स्पष्ट हो गयी। पिताजी अनुवाद बोलकर भी लिखवाते थे और उनका लिपिक तो मैं था ही। जब मैं दफ़्तर चला जाता तो यह दायित्व मेरी श्रीमतीजी निभातीं। जब कोई उनकी सहायता को उपलब्ध न होता तो पिताजी स्वयं लिखते।
अनुवाद के इसी काम में पिताजी दत्तचित्त होकर लगे हुए थे। पुस्तक अधिया गयी थी। पिताजी इसे शीघ्र समाप्त करना चाहते थे। पुस्तक के प्रकाशक 'सस्ता साहित्य मण्डल' का ऐसा अनुरोध भी था। चौबीस घण्टों में सोलह घण्टे वह इसी काम में जुटे रहते थे, तभी नेहरूजी का एक वाक्य व्यवधान बनकर सामने आया--"The National Herald has published my version by putting dots on i's and cutting t's."
यह अंग्रेजी भाषा में प्रयुक्त होनेवाला एक मुहावरा (फ्रेज़) था, जो हिन्दी की प्रकृति से भिन्न था। यहीं, इसी वाक्य पर अनुवाद की गाड़ी ठहर गयी। पिताजी दो दिनों तक सोचते रहे कि "putting dots on i's and cutting t's." का अनुवाद क्या हो। उन्होंने कई तरह से वाक्य-रचना को तोड़-मरोड़कर और सजा-सँवारकर देख लिया था, लेकिन उन्हें संतोष नहीं हो रहा था। अंततः उन्होंने अपने उन मित्रों से परामर्श लेना उचित समझा जो हिन्दी के अलावा अंग्रेजी के भी निष्णात विद्वान् थे।

समय लेकर पिताजी सबसे पहले डाॅ. नगेन्द्र से मिले, फिर बच्चनजी से, तत्पश्चात् अज्ञेयजी से। सबों ने एक स्वर में कहा कि "इसमें ऐसी क्या मुश्किल है, इस वाक्य का अर्थ तो स्पष्ट ही है कि 'नेशनल हेराॅल्ड ने मेरे कथन में नमक-मिर्च लगाकर, रद्दोबदल करके प्रकाशित कर दिया।" पिताजी ने तीनों मित्रों से कहा भी--'भई, इतना तो मैं भी समझता हूँ, लेकिन इससे मुझे संतोष नहीं होता। चाहता हूँ, नेहरूजी ने वाक्य-रचना में जिन शब्दों और मुहावरे के चयन से जैसा प्रभाव उत्पन्न किया है, कुछ वैसा ही चमत्कार हिन्दी-अनुवाद में भी प्रकट हो।'...
पिताजी अपने विद्वान् मित्रों से मिलकर निराश लौट आये, जिज्ञासा का निवारण न हुआ और अनुवाद रुका रहा। पिताजी का निर्बाध एकांत चिंतन चलता रहा। दो दिन बीत गये। एक रात मैंने पिताजी से इतना-भर कहने की हिम्मत जुटायी--'बाबूजी, सबों ने ठीक ही तो कहा है, आप वही लिखकर आगे क्यों नहीं बढ़ चलते, जो अज्ञेयजी, बच्चनजी या डाॅ. नगेन्द्र ने कही है?'
पिताजी ने मुझे समझाया--'हाँ, वैसा ही लिखकर बढ़ चलूँ तो मेरा गिरेबाँ आखिर कौन पकड़ेगा? किसे फुर्सत है? और, वैसा ही लिख देने में आपत्तिजनक भी तो कुछ नहीं; फिर भी मुझे संतुष्टि नहीं होगी। जानता हूँ, अंग्रेजी और हिन्दी की प्रकृति भिन्न है, इसके बाद भी मानता हूँ कि अनुवाद में नेहरूजी के कथन की प्रभाव-छाया तो होनी ही चाहिए।'...

मैं निरुत्तर था। दूसरे दिन, बहुत तड़के, पिताजी अर्किमेडीज़ की तरह चिल्लाये--'मिल गया, मिल गया!' हम सभी उनके कमरे की ओर यह जानने के लिए भागे कि उन्हें आखिर मिल क्या गया है। उनके पास पहुँचने पर ज्ञात हुआ कि उन्हें उस व्यवधानी वाक्य का अनुवाद मिल गया था और वह कितने प्रसन्न थे, यह उनकी मुख-मुद्रा पर स्पष्ट अंकित था। उन्होंने हमें बताया कि नेहरूजी के वाक्य से भी अधिक प्रभावी और वज़नदार वाक्य उन्होंने हिन्दी में ढूँढ़ निकाला है और वह है--"नेशनल हेराॅल्ड ने मेरे कथन में बिंदु-विसर्ग लगाकर प्रकाशित कर दिया है।"

पिताजी का कहना था कि अगर 'आई' पर अनुस्वार न लगाया जाए तो उसे 'ई' पढ़ा जा सकता है और अगर 'टी' को काटा न जाये तो वह 'एल' हो जाएगा, लिहाज़ा आई और टी में अनुस्वार और कट मार्क लगा ही रहता है, उसे अलग से लगाना नहीं पड़ता, लेकिन हिन्दी में बिंदु और विसर्ग अलग से लगाने होते हैं।

अब पिताजी संतुष्ट थे। अनुवाद की रुकी हुई गाड़ी आगे चल पड़ी। अनुवाद-कार्य इतना आसान भी नहीं होता, वह घोर परिश्रम, कठिन साधना, एकाग्रता, अनुशासन, मनोयोग और वज्रासन की माँग करता है; लेकिन, एक वाक्य के लिए पिताजी की अतिचिंता, अति-चिंतन और व्यग्र दौड़-भाग मुझे चकित करती है। जब कभी यह प्रसंग याद आता है, उनका प्रफुल्लित मुख-मण्डल मेरी आँखों में तैरने लगता है और उन्हीं से बार-बार सुना हुआ यह संस्कृत श्लोक कानों में गूँजने लगता है--
'एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः शासन्वितः।
सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके कामधुग्भवति।'

मैंने अपने जीवन में तीन ऐसे मनस्वी साधकों के दर्शन किये हैं--एक पिताजी, दूसरे हंसकुमार तिवारी और तीसरे श्री श्रीरंजन सूरिदेवजी--ये तीनों शब्द-साधक जब वज्रासन में होते तो जीवन-जगत् से निर्लिप्त हो जाते और घण्टों अक्षरों से मल्लयुद्ध करते रहते--एकाग्रचित्त होकर!
निःसंदेह, पिताजी भी शब्द में विराजनेवाली ब्रह्म-सत्ता के एकनिष्ठ उपासक थे।...

[चित्र : अपने घर के स्टूडियो में अज्ञेयजी का लिया हुआ उसी कालखण्ड का चित्र ; 1977-78 का.]

बुधवार, 28 जून 2017

मालूम था, सप्ताह में दो-तीन दिन माली आता है बेटी शैली के घर और देखभाल करता है बागीचे की, लेकिन मैंने कभी देखा नहीं था उसे। बीस दिनों के प्रवास में वह आया न हो, ऐसा तो नहीं है, मगर वह जब भी आया, मैं घर के अंदर, गुसलखाने में, शेव करता हुआ, अखबार पढ़ता या टीवी देखता रहा। आमना-सामना कभी हुआ नहीं था उससे मेरा। आज सुबह मैं बिलकुल उसके सामने जा पड़ा। तब मैं बारामदे में बैठा पान बना रहा था। वह आया और मुझसे छह फीट की दूरी पर खड़ा हो गया। मुझे लगा, उसे कुछ कहना है मुझसे। मैंने आँख उठाकर देखा उसे, तो पाया कि वह मुझे ही एकटक देख रहा है। मेरी आँखें उससे जैसे ही मिलीं, वह मीठा मुस्कुराया। मैंने सोचा, मुस्कुरा लेने के बाद वह कुछ कहेगा, लेकिन वह चुप था और लगातार मुझे घूरने की हद तक देखता हुआ मुस्कुराता जा रहा था। यह मुझे कुछ अजीब-सा लगा। यह बात भी मन में उठी कि मानसिक रूप से वह स्वस्थ भी है या...

मुझे उम्मीद थी, वह नमस्ते कहेगा, 'गुड मार्निंग' बोलेगा, लेकिन वह तो मुस्कुराता हुआ 'मौनी बाबा' निकला। मन में आया कि कहूँ उससे, 'भले आदमी, जब कुछ कहना ही नहीं है तो जाओ, अपना काम करो।' लेकिन वह स्थायी भाव में था, अडिग था। अब क्या करूँ, कुछ समझ नहीं पाया। माली भाई तब ही सामने से हटे, जब मुझसे मेरी एक अदद विवश मुस्कान उन्होंने वसूल ली।...

आज ही लगे हाथ दूसरा-तीसरा हादसा भी हो गया। परसों की वापसी की यात्रा है मेरी। मैं, श्रीमतीजी और बेटी के साथ 'लुल्लू माॅल' चला गया। बचपन में महामूर्खतापूर्ण एक खेल खेला करता था--'लुल्लूपाला'। सिलाई के धागों में ढेला बाँधकर पेंच लड़ाना और प्रतिपक्षी के धागे को काटकर उसे परास्त कर सुख पाना। लगता है, उसी 'लुल्लू' नाम पर एशिया का बेस्ट माॅल उठ खड़ा हुआ है। क्या नहीं मिलता वहाँ! मैंने सोचा, कुछ मेवे-मसाले खरीद ले चलूँ, यहाँ बड़े अच्छे मिलते हैं। दोनों देवियाँ जानती हैं कि माॅल में बहुत हलकान होना मुझे प्रिय नहीं है और पान न मिलने से मेरे अस्तित्व का नेटवर्क भी 'वीक' हो जाता है, सो वांछित सामग्री खरीद लेने के बाद उन्होंने मुझे टरका दिया, कहा--'जाइये, कार में सामान सेट कीजिए और वहीं बैठकर पान खाइये, हम अभी आते हैं।'

मैंने उनकी बात मान ली, क्योंकि मेरा नेटवर्क भी कमजोर पड़ रहा था। पार्किंग में खड़ी कार में सामान रखकर मैं बैठ गया और पान बनाने लगा। तभी एक सम्भ्रांत व्यक्ति सामने से आते दिखे। पास आकर उन्होंने एक मीठी मुस्कान मेरी ओर फेंकी और जब तक जवाबी कार्रवाई में मैं अपनी चवनियाँ मुस्कुराहट उन्हें लौटा पाता, वह आगे बढ़ गये।

अभी पाँच मिनट ही बीते होंगे कि माॅल के गणवेश में चालीस के आसपास की एक महिला ट्राॅली समेटती दिखी। जिस ट्राॅली से मैंने सामान खाली किया था, उसे लेने वह कार के समीप आयी और पास पहुँचते ही उसने भी एक मीठी मुस्कान दी। एक बार तो भ्रम हुआ कि मुझमें कहीं कोई गड़बड़ी तो नहीं? लोग मुझे देख-देखकर मुस्कुरा क्यों रहे हैं आखिर? फिर मैंने तय पाया कि नहीं, गड़बड़ तो कहीं कुछ नहीं; अच्छा-खासा आधी बाहोंवाला श्वेत-स्वच्छ कुरता, वैसा ही धवल पायजामा, आँखों पर ऐनक और पाँवों में सैंडल--सब यथास्थान है, गड़बड़ क्या होगी भला? लेकिन इस दफ़ा मैंने देर नहीं की, लगे हाथ मैंने भी एक फीकी-सी मुस्कान लौटनियाँ उसे दे दी। विलंब करने में यह खतरा भी था कि कहीं वह भी मालीजी की तरह वहीं अँटक गयी और मुझे देखकर मुस्कुराती खड़ी रही, तो मेरा क्या होगा! लेकिन चिंतनीय कुछ नहीं हुआ और मेरी असहज मुस्कान लेकर वह चली गई। उसके चले जाने के बाद मन में खयाल आया कि काश, वह एक सम्भ्रांत विदुषी होती तो मैं भी, पान से पिटी और सड़ी हुई अपनी बत्तीसी बचाता हुआ, एक 'एक्सट्रा लार्ज' साइड की मुस्कान उसे दे ही देता।

मुझे फ़िक्र हुई, अपरिचित लोगों के इस तरह मुस्कान लुटाने के पीछे आखिर माजरा क्या है, यह मुझे बेटी से पूछना ही चाहिए। उसे यहाँ रहते हुए एक साल हो गया है, कुछ तो समझा ही होगा उसने, इस रहस्यमयी मुस्कान का राज़!

बेटी ड्राइव कर रही थी, मैं उसकी बगलवाली सीट पर था और उसकी माता पीछे। माॅल से लौटते हुए मैंने पूरी बात बेटी को बतायी। उसने कहा कि 'यह यहाँ का स्वाभाविक अभिवादन है। वैसे भी, मलियाली लोग वेशभूषा से भिन्न भाषा-भाषियों को चिह्नित कर लेते हैं, इसीसे वे एक स्माइल देकर ऐसे लोगों का स्वागत करते हैं।' बेटी की इस बात से मैं चकित हुआ।

दौड़ती कार मेें जब मैैं यही प्रसंग सुना रहा था और बात ट्राॅली समेटनेवाली महिला तक पहुँची थी, तभी श्रीमतीजी ने मेरी अतिभाषिणी जिह्वा थाम ली और कहा--'वह संभ्रांत विदुषी भी होती तो उससे आपको क्या फ़र्क पड़ता था?' पत्नी नामक प्रजाति में यही बड़ी ख़ामी होती है। वे मूलतः दोष-दर्शन और छिद्रान्वेषण की अधिकारिणी होती हैं। अगर मेरे मन में ऐसी कामना जगी भी थी, तो इसमें कोई दोष कहाँ था? बस, कामना-भर ही तो थी। मैैंने दबी जबान मेें कहा--'लेकिन, इसमें आपत्तिजनक क्या हैै?'

श्रीमतीजी ने जो कुुुछ कहा, वह रेेेखांकित करनेे योग्य हैै--'आपत्तिजनक तो कुुुुछ भी नहीं, बस आप यह नहीं समझ पा रहे कि यह आपका यूूूपी-बिहार नहीं, केेेेरल हैै, जहाँ शत-प्रतिशत साक्षरता है। सामान्य लोग भी अंंग्रेजी केे शब्द, वाक्य समझ लेेेेते हैैं, महिलाएँ स्कूटी चलाती हैं और पुरुष पिछली सीट पर बैठे होते हैं। यहाँ स्त्री-पुरुष का भेद ही मिट गया है। यदि पुरुष आपकी ओर देखकर मुस्कुरा सकता है और इसी रूप में आपका स्वागत-अभिनन्दन कर सकता है तो स्त्रियाँ भी ऐसा कर सकती हैं। आप अपना बिहारी चश्मा उतार कर देखेंगे, तभी यह फर्क भी समझ सकेंगे।'

श्रीमतीजी की बातों से मेरे ज्ञान-चक्षु हठात् खुल गये। मैंने अपनी स्मृति को कुरेदा तो मुझे याद आया कि तीन दिन पहले ही जब मैं अथिरापल्ली प्रपात से लौटते हुए पहाड़ की चढ़ाई चढ़ रहा था, तो सामने से आती हुई हर उम्र की कई महिलाओं और पुरुषों ने मुझे अपनी मधुर मुस्कान से नवाजा था और मैं संकुचित हो उठा था। और, मार्ग में, हम सबों ने एकसाथ ही तो देखा था, एक ग्रामीण युवती को, जो अपने छोटे-से बालक और संभवतः पतिदेव को स्कूटर पर पीछे बिठाकर आराम से चली जा रही थी।...
बेटी और श्रीमतीजी की बातों से अब समझ में आया, वह मुस्कान अकारण तो नहीं ही थी, असहज भी नहीं थी। मैं ही अपने अनुभवों और संस्कारों के शिकंजे में था और उससे मुक्त नहीं हो पा रहा था।

मैं तो खैर पकी उम्र का व्यक्ति हूँ, श्रीमतीजी की अहैतुकी कृपा से सँभल भी गया हूँ; लेकिन अपने समस्त मित्रों को सावधान करना अपना दायित्व समझता हूँ कि यहाँ आपको कोई देखकर मुस्कुराये तो आप भी भद्रतापूर्वक मुस्कुराकर उसके अभिवादन-अभिनन्दन का प्रत्युत्तर दें। भारत की इस पावन भूमि में यथासंभव नजरें झुका के चलें, कहीं ऐसा न हो कि किसी से आपकी आँख लड़ जाए और आपको कोई मुगालता हो या मुस्कुराने की विवशता से आप किसी द्विविधा में पड़े हिचकोले खाने लगें... ठीक मेरी तरह।...
(14-06-2017)