मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

शीर्षक-विहीन...

पिछली रात किसी ने दी आवाज़
मैं उस पुकार की खामोशी से
शिनाख़्त करता रहा ।
खिल उठते हैं फूल बेशुमार, रंग-बिरंगे
मोगरे-लिलि-गुलदाउदी के
जब-जब यह अजानी पुकार सुनी है
ऐसा ही होता आया है,
जीवन में तब-तब वसंत आया है।

यह मुगालता भी अजीब है
कि जो दीखता है
वह होता नहीं
और जो होता है
उसका वजूद नहीं।

सोचता हूँ,
किस रहस्य-लोक से आती है पुकार ?
कौन है जो पुकरता है मुझे
और आँखें खोलते ही हो जाता है विलुप्त
वह तुम नहीं हो सकते न?
तुम होते तो अंतर्धान क्यों होते?
मुझको ही तुम्हारे होने का
भ्रम हुआ होगा
वह होगा कोई गुल नया,
तुम्हें ही पता होगा?

अब इस फिक्र से हलकान हूँ कि
वह किसकी पुकार थी,
जो आवाज़ देकर हो गया ख़ामोश
क्यों उसकी पुकार इतनी बेकरार थी।

जानता हूँ,
परदों के पीछे भी
हो रहा यातनाओं का सफ़र
सामने जो मंज़र है
दिखावे की दुनिया है...
आवाज़ देकर तुम गुमसुम न रहो
तो कैसे चलेगा बापर्दा
यातनाओं का कारवां?

'जिन पर गुज़रता है हादसा,
वही जानते हैं,
हमदर्द तो अफ़सोस भी
डकार जाते हैं..।'
(--आनन्द. 6-12-2017)

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

पाटलिपुत्र के सहित्याकाश में जब चमकी थी 'बिजली'...सजी थी 'आरती'...(समापन किस्त, 5)

फिर आया वह दौर, जिसमें बिहार की तरुणाई ने अंगड़ाई ली थी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति का दौर! आन्दोलन के समर्थन में जगह-जगह होनेवाली नुक्कड़ कवि-गोष्ठियों में नागार्जुन और फणीश्वर नाथ 'रेणु' के नेतृत्व में हम युवा उत्साही कवियों, साहित्यानुरागियों का एक दल अनायास बन गया था। जयप्रकाशजी की प्रेरणा से पटना सिटी के चौक पर तीन युवा कवि बारह घंटे की सांकेतिक भूख-हड़ताल पर बैठे थे, उनमें एक मैं भी था। भूख-हड़ताल की समाप्ति पर हमें शिकंजी पिलाने के लिए महाकवि नागार्जुन पधारे थे। उसके बाद जाने कितने चौराहों पर हमने उनकी अगुआई में कविताएँ पढ़ी थीं, भाषण दिए थे और चायखानों में बैठकर सम-सामयिक चर्चाएँ की थीं। आन्दोलन की धार को और अधिक पैनापन देने के लिए नागार्जुन के पास एक-से-बढ़कर एक कारगर साहित्यिक हथियार थे। युवा साथियों के साथ नागार्जुन नवयुवक बन जाते थे। वह अनूठी आत्मीयता और परम स्नेह के साथ हमें अपने साथ ले चले थे। हम सभी उन्हें प्यार से 'नागा बाबा' कहते थे। वार्धक्य की अशक्तता उन्हें रोक न पाती थी, स्वस्थ्य की नरम-गरम स्थितियाँ उनकी गति को अवरुद्ध न कर पाती थीं। सम्पूर्ण क्रांति के आन्दोलन में नागार्जुन मसिजीवियों के प्रखर नेता थे। उन दिनों उनकी एक कविता बहुत लोकप्रिय हुई थी, जिसका पाठ वह झूम-झूमकर और चुटकियाँ बजाकर करते थे --
''इन्दुजी, इन्दुजी!
क्या हुआ आपको, क्या हुआ आपको ?
बेटे को ताड़ दिया, बोड़ दिया बाप को ?
क्या हुआ आपको...?"

बिहार आन्दोलन की गर्म हवाओं में पूरा प्रदेश तपने लगा था। सर्वत्र हिंसक और अहिंसक अवरोध जारी था। हम नवयुवकों की टोली महाकवि नागार्जुन की अगुआई में नुक्कड़ कवि-गोष्ठियाँ करती चलती। कितने उत्साह और ऊर्जा से भरे दिन थे वे ! हम दिन भर एक नुक्कड़ से दूसरे नुक्कड़ का परिभ्रमण करते और जन-जागरण का अभियान चलाते। बीच-बीच में जब भी अवकाश मिलता, हम सभी पटना के कॉफ़ी हाउस या कॉफ़ी बोर्ड की शरण लेते। उन दिनों ये दोनों संस्थान आन्दोलन के युवा नेताओं, प्रबुद्ध नागरिकों, रचनाधर्मी युवा साथियों के प्रमुख अड्डे थे। वहीं आन्दोलन की दशा-दिशा पर गहन विचार-विमर्श होता और आगे की रणनीति तय होती थी। वहाँ एक कप कॉफ़ी का मतलब था--एक घंटे का विश्राम ! कॉफ़ी हाउस की प्रत्येक बैठक में रेणुजी अनिवार्य रूप से उपस्थित रहते थे। चर्चाओं का दौर चलता, कॉफ़ी पर कॉफ़ी पी जाती और हम युवा रचनाकार उत्साहपूर्वक आन्दोलन-समर्थित अपनी-अपनी रचनाएँ उन्हें सुनाते। रेणुजी और नागार्जुनजी पूरे मनोयोग से कविताएँ सुनते और आवश्यक संशोधन-परिमार्जन की सलाह देकर हमारा मार्गदर्शन-उत्साहवर्धन करते। जिस रचना को उन दोनों की स्वीकृति मिल जाती, वह नुक्कड़ कवि-गोष्ठियों में पढ़ी जाती।

पटनासिटी के चौक पर हमारे दो प्रमुख अड्डे थे--भज्जन पहलवान का होटल और सिटी स्वीट हाउस। नागा बाबा सिटी में होते तो हम सदल-बल वहीं जमे रहते। चाय, चर्चाओं, काव्य-विमर्श का दौर अनवरत चलता। हमारे लिए संघर्षों के बीच वे बहुत कुछ सीखने-समझने के दिन थे। हमारा दायरा बढ़ रहा था। हमें बुजुर्गों का आशीष, अग्रजों का मार्गदर्शन और समवयसियों का अतीव उत्साह मिला था। जैसे-जैसे हमारा संघर्ष बढ़ा, शासन का दमन-चक्र भी बढ़ता गया। मुझे याद आते हैं उस दौर के कई नाम, जो हमारी पूर्ववर्ती पीढ़ी के थे, अग्रज थे हमारे--कवि सत्यनारायण, प्रो. आनन्दनारायण शर्मा, गोपीवल्लभ सहाय, कवि राधेश्याम आदि, जिनकी पंक्तियों में तीखी धार थी और तेज आक्रामक अंदाज़ भी था। कवि सत्यनारायणजी की दो पंक्तियाँ देखिये--
'इस नगरी में यही हुआ है,
आग नहीं, सब धुआँ-धुआँ है।'

राधेश्यामजी ने उन्हीं दिनों की गर्म हवाओं में कहा था--
'लंग भरता हुआ आदमी तन के खड़ा हो जाता है।'

हमारी पीढ़ी के शायर प्रेम किरण उसी काल में चर्चित हुए थे और आज तो मकबूल शायरों में शुमार हैं। उनका यह मतला मुझे बहुत मुतासिर करता है--
'एक बच्चा न मिला गाँव में रोनेवाला,
अबके बैरंग ही लौटा है खिलौनेवाला।'
उस दौर में मेरी एक कविता की भी भरपूर सराहना हुई थी--
'तल्खियों से भरा एक जुलूस
चल पड़ा है...।'

बिहार आन्दोलन अपनी चरम परिणति पर पहुँचा ही था कि सन् 1974 में स्नातक अंतिम वर्ष की परीक्षा देकर मै पिताजी के पास दिल्ली चला गया, जो उन दिनों जयप्रकाशजी के आन्दोलन को समर्थित साप्ताहिक पत्र 'प्रजानीति' का संपादन कर रहे थे और जिन्हें जयप्रकाशजी ने ही यह दायित्व उठाने के लिए पटना से दिल्ली भेज दिया था। पटना (बिहार) तो छूटा, मेरी संपृक्ति न छूटी। वह आज भी यथावत् बनी हुई है।




पिताजी की छोड़ी हुई विरासत को परवर्ती पीढ़ियों ने बहुत आगे बढ़ाया है। 'बिजली' और 'आरती' को साहित्य की प्राचीन और नवीन धाराओं के संगम का उज्ज्वल आयोजन कहना उचित होगा। मुझे यह देखकर परम प्रसन्नता और गौरव की अनुभूति होती है कि पिताजी और अज्ञेयजी--दो अभिन्न मित्रों के अथक परिश्रम का स्मारक बनकर ये दोनों पत्रिकाएं तीन जिल्दों में बिहार हितैषी पुस्तकालय में आज भी सुरक्षित हैं।

--आनन्दवर्द्धन ओझा.
27/09/2017

[चित्र : 1) विशाल जन-समुद्र को संबोधित करते जयप्रकाश नारायणजी 2) पटना जंक्शन पर बायें से रेणुजी, अज्ञेयजी, मुक्तजी 3) पूज्य पिताजी 4) नागार्जुनजी।]

रविवार, 3 दिसंबर 2017

माँ की 49वीं पुण्यतिथि पर...!

[बस अर्ध शती पूरी होने में एक बरस बाकी है और माँ, तुम्हारे बिना मन का आँगन वैसा ही है--बियाबान-सा! 4 दिसम्बर 2014 की वही पुरानी कविता माँ की स्मृति में, उसके पूज्य चरण में अर्पित...]

माँ : एक अनुस्मृति...

अब बहुत याद नहीं आती उसकी--
वह, जो बहुत पहले
बीच राह में मुझे छोड़ गयी थी;
लेकिन मेरी स्मृतियों के
निर्मल कोश में
सदा-सदा के लिए अंकित है वह...!

अब बहुत याद नहीं आती उसकी,
किसी कार्य-प्रयोजन पर,
किसी अनुष्ठान-विशेष पर,
जैसे छोटे भाई का विवाह हो,
मेरी बिटिया की शादी हो
और देव-पितर के स्मरण के बाद
मातृका-पूजन करते हुए
उसके नाम का अन्न-ग्रास
निकाला गया हो और--
ज्येष्ठाधिकार के कारण
मुझे ही वह थाली उसे सौंपनी हो
तो बड़ी शिद्दत से याद आती है वह,
चुभती हुई यादें--
मर्म को बेधती हुई...!

हर साल मेरे साथ
दिसंबर माह में ऐसा ही होता है,
यादों के आसमान में
पीछे, बहुत पीछे कहीं
उड़ता चला जाता हूँ
और उसकी पतली किनारीवाली
सफ़ेद साड़ी का आँचल थाम लेता हूँ,
पूछता हूँ उससे--
'तुम कैसी हो अम्मा?
बहुत दिनों से याद भी नहीं आयीं,
क्यूँ...?'
वह कुछ नहीं कहती,
रहती है मौन
और जैसी उसकी आदत थी,
धूप में स्याह पड़ जानेवाले
पावर के शीशे का अपना चश्मा
वह ऊपर उठाती है और
आँचल के एक छोर से
पोछती है अपनी गीली हो आई आँखें...
यह दृश्य देखते हुए
मेरी आँखें धुंधली पड़ जाती हैं
और ओझल होने लगती है
उसकी सम्मोहक छवि...!

मेरे जैसे दुष्ट, अशालीन और उद्दंड बालक को
सही राह पर लाने के लिए
उसने जाने कितनी पीड़ा सही-भोगी थी,
कष्ट उठाये थे...
मेरी बड़ी-बड़ी शैतानियों पर
कैसे वह वज्र कठोर हो जाती थी
और मुझे दण्डित कर
स्वयं पीड़ित होती थी...!
ब्राह्म मुहूर्त्त में हमें जगाने के लिए
वह जीवन-भर
सुबह चार बजे जाग जाती,
शरीर, मन और मस्तिष्क के सुपोषण के लिए
सौ-सौ जतन करती
पूजा-पाठ, कीर्तन करती,
दफ्तर जाती, घर के दायित्व निभाती
विद्यालय-निरीक्षण के लिए यात्राएं करती...
उसका तपःपूत कर्ममय जीवन
याद करता हूँ तो हैरत होती है
और अपनी नादानियों के लिए
आज होती है ढेर सारी कोफ़्त...!

उसका अंतिम दर्शन तो
सचमुच अलौकिक दर्शन था--
सुबह-सबेरे वह गई थी गंगा के घाट
मैं उसे पानी के जहाज तक
छोड़ने गया था--
जेटी से होते हुए मैं उसके साथ
जहाज के सबसे ऊपरी तल पर
प्रथम श्रेणी में जा पहुंचा...
मेघाच्छादित आकाश था
नीचे गंगा की कल-कल निर्मल धारा थी
और तेज शीतल-स्वच्छ हवा
निर्द्वन्द्व बह रही थी,
मैंने जहाज के अग्र भाग में
एक छोर पर पड़ी आराम कुर्सी के पास
रखा उसका सामान,
झुककर उसके चरण छुए
और फिर वापसी के लिए चल पड़ा--
मैं पांच कदम ही बढ़ा था
कि उसने पुकारा मुझे,
मैंने पलटकर उसकी तरफ देखा
और हतप्रभ रह गया...!

श्वेत साड़ी में,
तेज हवा में लहराता उसका आँचल
उड़ते, खुले, घने कुंतल केश--
वह कोई देवदूती-सी दिखी मुझे...
जैसे माता जाह्नवी स्वयं
आ खड़ी हुई हों सम्मुख,
मैं मंत्रमुग्ध-सा उसके पास पहुंचा,
उसने अपने दोनों हाथ
मेरे कन्धों पर रखे और--
थोड़े उलाहने, थोड़े उपदेश दिए,
समझाया मुझे...!
मैं हतवाक था, कुछ कह न सका,
बस, उस दिव्य मूर्ति को
अपलक देखता रहा...
और अचानक--
जहाज का भोंपू बज उठा;
पुनः प्रणाम कर लौटना पड़ा मुझे...!
फिर कभी उसे देखना,
बातें करना नसीब न हुआ;
लेकिन उसकी दिव्य मूर्ति,
वह भव्य-भास्वर स्वरूप आज भी
मन-प्राण पर यथावत अंकित है
और उसका वह स्वर गूंजता है कानों में...!
खूब जानता हूँ,
उन्हीं स्वरों ने, उसी पुकार ने
मुझे कमोबेश ठीक-ठाक
आदमी बनाया है...!

सोचता हूँ,
क्यों नहीं बहुत याद आती है वह...?
क्या आधी शती के दीर्घ-काल ने
उसकी स्मृतियों को
इतना धुंधला कर दिया है
कि मन अब उसकी ओर जाता ही नहीं...??

उसकी पुण्य-तिथि पर
आज जब कलम उठाई थी,
सोचा था, स्मृति-तर्पण करूंगा ,
नमन करूंगा उसे,
लिखूंगा मैं भी
अपनी माँ पर एक कविता...!
मानता हूँ, मुझसे माँ पर कविता नहीं होती...!!

'विदा-जगत' कहने के ठीक पहले
एकादशी की पूर्व-संध्या में
वह बाज़ार से ले आई थी
भजन-मग्न पवन-सुत का एक चित्र,
दूसरा राम-जानकी का...!
भजन की मुद्रा में
आज भी मग्न हैं महावीर
और मंद-मंद मुस्कुराते हैं प्रभु राम...
बस, माता जानकी खुली आँखों से निर्निमेष
देखा करती हैं जगत-प्रवाह--
जिसे पार कर गई है मेरी माँ...!!

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

पूज्य पिताजी की 22वीं पर पुण्य-तिथि पर... (समझ नहीं आता कैसे बीत गये बाईस बरस : एक पुरानी रचना...!)

।। बाबूजी की चरण-पादुका, चश्मा-चट्टी ।।
[पूज्य पिताजी के नाम एक भावुकतापूर्ण काव्य-पत्र]

"मैं ले आया हूँ गृह-प्रदेश से
बाबूजी की चरण-पादुका, चश्मा-चट्टी!
खोज रहा पगचिह्न 
डाल अपनी उँगली
जूते में,
हाँ, मुझे मिली है पगचिन्हों की
गहरी छाप, जिसे बारम्बार 
कांपती उँगलियों से
छूता हूँ, सहलाता हूँ,
फिर मस्तक से लगाता हूँ,
करके पॉलिश आज
उनकी जूती चमकाता हूँ,
सच कहता हूँ,
मेरी आँखें धुँधला जाती हैं,
कितनी यादें मेरे मन में 
उमड़ी आती हैं…!

वे कितने शुभ्र चरण थे
जो अथक यात्री-से 
आजीवन चलते आये थे,
पद से कर आघात 
पादुका दलते आये थे,
कहाँ गए वे चरण.… ?
कहाँ गए वे चरण 
जिनका मैं वंदन करता था,
जिनकी रज को
मैं मस्तक का चन्दन कहता था…?
जान रहा हूँ,
पूज्य चरण वे नहीं मिलेंगे,
अब वरद हस्त
सिर पर रखने को नहीं उठेंगे।

वो चट्टी की खट-पट घर में 
सुनने को भी नहीं मिलेगी,
कोई कलिका 
हृद-प्रदेश में नहीं खिलेगी।
ऋषि-तपस्वी की कुटिया में 
जो गूंजा करती थी,
उसी नाद-सी कर्ण-मधुर झनकार 
विलुप्त हो गई इस जीवन से,
खोज कहाँ से लाऊंगा वह स्वराघात 
किस जन-जीवन से, किस वन से…? 

धो-पोंछ कर साफ़ किया है उनका चश्मा 
सम्मुख रखकर देख रहा हूँ निर्निमेष, 
चुभता-सा कुछ लगता मन में,
कोई बाण से बींध रहा हो
जैसे मेरा ह्रदय-प्रदेश...!
वहाँ भी अतल-तल तक बेधती 
आँखें नहीं हैं,
झील-सी प्रशांति समेटे  
मर्मबेधी, पारदर्शी आँखें नहीं हैं !
कौन जाने कहाँ छुप गईं आँखें,
क्यों तारे-सी चमकती बुझ गईं आखें ?
पावर के शीशे के पार देखने की 
जब-जब करता हूँ मैं कोशिश 
बस, धुँधला-सा जैसे सबकुछ हो जाता है,
स्वप्न-भंग पर जैसे 
सपना खो जाता है!

जानता हूँ,
यही जीवन-सत्य है, फिर भी ,
मन के प्रश्न बहुत अकुलाते हैं,
स्मृतियों के एक भँवर में
हम तो डूबे जाते हैं…! 

आप नहीं हैं पास हमारे 
बरसों-बरस के बाद, सत्य 
स्वीकार किया मैंने,
इस चरण-पादुका, चट्टी पर
अधिकार किया मैंने…!
जब तक जीवन है,
इस पर मैं तो पॉलिश  करता जाऊंगा
और सँजोये रखूंगा मन में
स्मृतियाँ--मधुर-मनोहर, मीठी-खट्टी!
मैं ले आया हूँ गृह-प्रदेश से
बाबूजी की चरण-पादुका, चश्मा-चट्टी!!"...



(--आनन्द, 2 दिसम्बर.)

मंगलवार, 28 नवंबर 2017

पाटलिपुत्र के सहित्याकाश में जब चमकी थी 'बिजली'...सजी थी 'आरती'...(4)

सन् 1966 में मैं पटनासिटी की धरती पर नौवीं कक्षा का विद्यार्थी बनकर अवतरित हुआ। नया माहौल, नया विद्यालय (श्रीमारवाड़ी उ. मा. विद्यालय), नये मित्र मिले। घर में तो पुस्तकों का साम्राज्य था ही, अन्यान्य विषयों की पुस्तकें चाटने को बिहार हितैषी पुस्तकालय का विशाल भण्डार भी मिला। सायंकाल में मैं अपने नये मित्रों के साथ वहीं रमने लगा। कुछ ही समय में मेरे मित्रों की फेहरिस्त लंबी हो गयी, जिनमें प्रमुखतः कुमार दिनेश, शरदेन्दु कुमार, विनोद कपूर, नन्दकिशोर यादव, जगमोहन शारदा, शम्मी रस्तोगी, नीरज रस्तोगी, सुरेश पाण्डेय, राणा प्रताप, महेन्द्र अरोड़ा और वयोज्येष्ठ नवीन रस्तोगी आदि थे। विद्यालय और महाविद्यालय के द्वार लाँघने में छह-सात वर्षों की अवधि वहीं व्यतीत हुई। हम किशोर से नवयुवक बने, सुबुद्ध हुए और उत्साह-उमंग से भरे साहित्य-प्रेमी बने।

पटनासिटी की भूमि पर हम मित्रों ने खूब उधम मचाया, कचरी-अधकचरी कविताएं लिखीं और सुधीजनों का प्रचुर प्रोत्साहन प्राप्त किया। सन् 1968 से मैं आकाशवाणी, पटना के 'युववाणी' में अपनी कविताओं का पाठ करने लगा था। 1971 के बांगलादेश मुक्ति संग्राम के अनेक शरणार्थी जब हमारे नगर में आ ठहरे तो हमारी मित्र-मण्डली उनकी हितचिंता में कवि-गोष्ठियाँ आयोजित करती, जिसमें हम सभी जोशो-खरोश से भरी कविताएँ पढ़ते, भाषण करते।

इसी भूमि पर तखत श्रीहरमन्दिर साहब के दर्शनार्थ जब शहीदे-आज़म भगतसिंह की पूजनीया माताजी (जगत्माता विद्यावती देवी) पधारीं तो उनका एक कार्यक्रम हितैषी पुस्तकालय में भी रखा गया। वहीं मुझे उनके पूज्य चरणों को स्पर्श करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और उन्होंने अपना वरदहस्त मेरे सिर पर रखा था। उनके तप, त्याग, बलिदान और संघर्षपूर्ण जीवन से आज सभी परिचित हैं। मेहनतकश उनके दायें हाथ का पंजा ख़ासा बड़ा था। उनके वरदहस्त ने मेरा पूरा मस्तक आच्छादित कर दिया था, अद्भुत शीतल छाया पाने की सुखद अनुभूति हुई थी मुझे।... पास आये हर प्राणी के लिए उनके आँचल में असीम स्नेह, अपरिमित आशीष था...!

संभवतः १९७० में, पटनासिटी के बिहार हितैषी पुस्तकालय के सभागार में छोटा-सा आयोजन हुआ था, जिसमें तेजस्वी सांसद, प्रखर वाग्मी और निर्भीक कवि श्रीअटल बिहारी बाजपेयीजी पधारे थे। उनका ओजस्वी भाषण हम मित्रों ने कृतार्थ होकर पूरे मनोयोग से सुना था। मैं उनकी वक्तृता पर मुग्ध था। वहीं मित्रवर कुमार दिनेश के सौजन्य से वाजपेयीजी के एकमात्र दर्शन और मुख्तसर-सी मुलाक़ात का सौभाग्य मुझे मिला था तथा उनकी सज्जनता-सरलता से मैं अभिभूत हो उठा था...!

मुझे 1972 के शरद महोत्सव की याद है, जब मैंने हितैषी पुस्तकालय के मंच से अपनी दो कविताओं का सार्वजनिक रूप से पहली बार पाठ किया था। इसकी अध्यक्षता महाकवि स्व. केदारनाथ मिश्र 'प्रभात'जी ने की थी और संचालन किया था आचार्यश्री श्रीरंजन सूरिदेवजी ने। मेरे काव्य-पाठ के बाद जोरदार करतल-ध्वनि हुई थी। आयोजन की सफलता और अपने काव्य-पाठ की प्रशंसा से आत्म-मुग्ध मैं जब घर लौटा और पिताजी के सामने पड़ा तो उन्होंने बताया कि "प्रभात और सूरिदेवजी आये थे और दोनों तुम्हारे काव्य-पाठ की मुखर प्रशंसा कर गये हैं। प्रभात कह रहे थे कि 'बड़ा तेजस्वी बालक है, मैं तो उसकी कविता सुनकर ही समझ गया था कि उसे यह संस्कार किसी सिद्ध-पीठ से ही प्राप्त हुआ है! लेकिन तब यह अनुमान न कर सका था कि वह तुम्हारे ही सुपुत्र हैं!'... जाने क्या-कैसा लिखने लगे हो तुम, कभी मुझे तो कुछ दिखाते नहीं।"





महाकवि प्रभातजी की प्रशंसा से मैं पुलकित हुआ था और यह सोचकर विस्मित भी कि कितना उदार और विशाल हृदय है उनका! नव-पल्लवों, नयी प्रतिभाओं और नवोदित कवि-कलाकारों में वह भविष्य की संभावना देखते थे, उन्हें बढ़ावा देते थे और उन्हें प्रोत्साहित करते थे।...
[क्रमशः]

[चित्र  : 1) जगत्माता विद्यावती देवी; 2) अटलबिहारी वाजपयी; 3) महाकवि केदारनाथ मिश्र 'प्रभात'; 4) बिहार हितैषी पुस्तकालय, पटनासिटी; 5) महाविद्यालय के दिनों के आनन्दवर्धन, तत्कालीन परिचय-पत्र में।

शनिवार, 25 नवंबर 2017

पाटलिपुत्र के सहित्याकाश में जब चमकी थी 'बिजली'...सजी थी 'आरती'...(3)

उसी काल (सन् 1942) की पिताजी से सुनी हुई एक मधुर कथा मन में कौंध रही है। पटना विश्वविद्यालय के रजत-जयन्ती-समारोह में सम्मिलित होने के आमंत्रण पर सुभद्रा कुमारी चौहान और कवि बच्चन पटना पधारे। बच्चनजी और सुभद्राजी ने पत्र द्वारा पटना आगमन की अग्रिम सूचना पिताजी को दी थी। बच्चनजी ने लिखा था कि उनके ठहरने की व्यवस्था विश्वविद्यालय की ओर से अन्यत्र की गयी है, पिताजी वहीं आकर मिलें। इसके पहले बच्चनजी जब कभी पटना आये, पिताजी के पास ही ठहरे। यह पहला मौका था, जब आयोजकों ने उनके ठहरने की व्यवस्था अन्यत्र की थी। इलाहाबाद विश्विद्यालय से उन्हें पर्याप्त अवकाश भी नहीं मिला था। सुभद्राजी से पिताजी के पुराने संबंध थे--अत्यन्त आत्मीय; उनकी प्रथम काव्य-पुस्तिका 'मुकुल' के प्रकाशन-काल से, जिसे पिताजी ने ही इलाहाबाद की अपनी प्रकाशन संस्था 'ओझा-बंधु आश्रम' से प्रकाशित किया था। बहरहाल, निश्चित तिथि पर पिताजी पहले बच्चनजी से मिले, फिर उन्हें साथ लेकर सुभद्राजी के पास पहुँचे। वह पूरा दिन तो विश्वविद्यालय के समारोह में बीत गया और रात की रेलगाड़ी से उन दोनों को क्रमशः इलाहाबाद तथा जबलपुर के लिये प्रस्थान करना था; लेकिन वे दोनों बज़िद हो गये कि उन्हें पिताजी के घर तो जाना ही है। समय कम था और पटना महाविद्यालय से पटनासिटी की दूरी तकरीबन 6-7 किलोमीटर थी। बच्चनजी का तर्क था कि पिताजी के घर गये बिना वह लौट जायेंगे तो उन्हें लगेगा ही नहीं कि वह पटना आये थे। सुभद्राजी की इच्छा उस घर को एकबार प्रणाम करने की थी, जिसमें पिताजी रहते थे। दोनों की शर्त थी कि वहाँ रुकेंगे बिल्कुल नहीं, पर जायेंगे जरूर। पिताजी विवश हो गये और दोनों को अपनी कार से ले चले पटनासिटी की ओर...।

घर पहुँचकर सुभद्राजी ने सकारण (संभवतः पितामह की स्मृति में) आवास को बहुत श्रद्धा-भाव से विनीत प्रणाम किया और पिताजी ने चाय बनवाने की बात पूछी तो बच्चनजी ने वहीं खड़े-खड़े अहाते के गमले से तुलसी-पत्र तोड़े और उसे मुँह में डालकर बोले--'लो, मैं तो तृप्त हुआ, अब लौट चलो।' पिताजी ने प्रतिवाद किया और कहा--'भाई, यह भी क्या बात हुई? एक कप चाय पीने का वक़्त तो है ही अभी।' बच्चनजी ने कहा--'बिल्कुल नहीं है। दो-दो ठिकानों पर जाना है, सामान समेटना और उठाना है, फिर स्टेशन पहुँचना है, वह भी समय से।' पिताजी का मन मान नहीं रहा था, उन्होंने कहा--'तुलसी के दो पत्तों से भला क्या होता है?'

बच्चनजी हुलसकर बोले--'क्यों नहीं होता? जब तुलसी के एक पत्ते से ऋषि दुर्वासा और सम्पूर्ण साधु-समाज तृप्त हो सकता है तो मैं क्यों नहीं हो सकता ?' बच्चनजी के तर्क से पिताजी विवश हो गये और उन्हें अपनी सुभद्रा बहन तथा परम मित्र के साथ तत्क्षण बाँकीपुर लौटना पड़ा था।... रात की गाड़ी में दोनों स्वजनों को बिठाकर, विदा करने के बाद ही, पिताजी घर लौटे थे...!





'आरती' की आभापूर्ण दीपशिखा दो वर्षों तक निष्कंप जलती रही और उसका हर अंक अपनी शान का परिचायक बना रहा। सम्माननीय राजेंद्र बाबू और वात्स्यायनजी ने उसके लिए क्या-कुछ किया, यह तो अवांतर कथा है, लेकिन सन् 42 के द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका में 'आरती' का प्रकाशन असंभव हो गया; क्योंकि बाजार से स्याही और कागज़ नदारद हो गया था। 'आरती' की ज्योति निष्प्रभ हुई।... लेकिन मुझे लगता है, वह अपने दायित्व की पूर्ति कर चुकी थी--साहित्यिक चेतना जगा चुकी थी जन-मन में।

सन् 1948 में पिताजी को आरती मन्दिर प्रेस से एक तरह से बलात् उखाड़कर आकाशवाणी, पटना के प्रांगण में पहुँचा दिया गया। पिताजी की जीवन-दिशा बदल गयी। ये बात और है कि वहाँ भी उनका काम लिखने-पढ़ने का ही था। थोड़े ही समय में वह हिन्दी सलाहकार से हिन्दी वार्ता विभाग के प्रोड्यूसर बना दिये गये। जीवन अपनी राह चल पड़ा और समय को पंख लगे।...
[क्रमशः]

[चित्र : 1) बच्चनजी-मुक्तजी, 1942; 2) सुभद्रा कुमारी चौहान; 3-4) 'आरती' में प्रकाशित कवि-रचनाकारों के चित्र; 5) आरती मन्दिर प्रेस का भग्नावशेष, जो आज भी अतीत की स्मृतियाँ समेटे खड़ा है।]

बुधवार, 22 नवंबर 2017

पाटलिपुत्र के सहित्याकाश में जब चमकी थी 'बिजली'...सजी थी 'आरती'...(2)

लेकिन, घर से इतनी दूर, पिताजी का पद्मा-प्रवास दीर्घकालिक न हो सका। वह मन में एक नया स्वप्न लेकर पटनासिटी लौट आये। लेकिन उस स्वप्न के साकार होने में वक़्त लगा। उन्होंने मित्रवर अज्ञेयजी (स.ही. वात्स्यायन) को सहयोग के लिए आवाज़ दी और अज्ञेयजी की सदाशयता देखिये, वह आ पहुँचे पिताजी के पास--भट्ठी के पास की एक गली में--मालसलामी। अज्ञेयजी आये तो दस दिनों तक पिताजी के साथ ही रहे। दोनों मित्रों ने मिलकर एक स्वप्न को साकार करने का संकल्प किया। सुबह-शाम गंगा-स्नान, साहित्यिक और पारिवारिक गप-शप और रात्रि में लालटेन की मद्धम रौशनी में पठन-पाठन। पटना के पुष्ट मच्छर सोने न देते तो अज्ञेयजी लालटेन बुझाकर उसका मिट्टी का तेल पूरे शरीर पर लगा लेते और गहरी नींद सो जाते--कच्ची मिट्टी के फर्श पर; पिताजी से कहते, "घासलेट' का यह प्रयोग और परीक्षण मैं जेल-प्रवासों में निरंतर करता रहा हूँ, आप चिंता न कीजिये।"

दस दिनों के प्रवास में अज्ञेयजी ने पिताजी के स्वप्न को साकार करने में पूरा सहयोग देने का वचन तो दिया ही, साहित्य की सर्वांग सुन्दर मासिक 'आरती' की परिकल्पना की और उसके प्रवेशांक का दुरंगा मुखपृष्ठ भी सजा गये।...

सन् 1940 में 'आरती' का आलोक चहुँओर फैला। पिताजी और अज्ञेयजी का स्वप्न साकार हुआ। ऐसा नहीं था कि इसके पहले पटना से साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं प्रकाश में आई ही नहीं थीं। वर्षों पहले पटना मध्य से 'शिक्षा' का संपादन पितामह द्वारा किया गया था। ब्रजशंकर वर्मा द्वारा संपादित 'योगी' और रामबृक्ष बेनीपुरी-गंगाशरण सिंह के सम्मिलित संपादन में 'युवक' का प्रकाशन हो चुका था, लेकिन दुर्योग कि पत्र अल्पजीवी सिद्ध हुआ। जब 'आरती' प्रकाशमान हुई, तब 'बालक' और 'किशोर'--ये दो पत्र प्रकाशित हो रहे थे। सन् 1940 में, पिताजी को संबोधित एक पत्र में, गया के सुप्रसिद्ध साहित्यकार मोहनलाल महतो वियोगीजी ने एक प्रवेग में कतिपय आलंकारिक पंक्तियाँ लिखी थीं :
"भाई,
'आरती' आई। धन्यवाद! प्रकाशमान है।...मगही बोली में एक शब्द है--'मराछ'। मराछ उस अभागी को कहते हैं, जिसका बच्चा नहीं जीता, मर-मर जाता है। बिहार की साहित्य-भूमि मराछ है। हाँ, 'बालक', 'किशोर' हैं, पर बालकों और अल्हड़ किशोरों के बल पर गृहस्थी कायम नहीं रह सकती। एक 'युवक' (बाबू गंगाशरण सिंह और रामबृक्ष बेनीपुरी के संयुक्त संपादन में पटना से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका) था, जिससे आशा थी, भरोसा था, वह मर ही चुका! लड़का न सही, लड़की का ही वंश चले--कुछ चले तो। 'युवक' न सही, बिटिया 'आरती' ही घर को बेचिराग होने से बचावे।... जैसी भगवान् की  इच्छा!

मैं श्रीवात्स्यायनजी को दूर से जानता हूँ। हुतात्माओं के इतिहास में जो सबसे जाज्वल्यमान परिच्छेद है, उसमें बार-बार मैंने इनका नाम पढ़ा है। यदि इनका सारा क्रांतिकारी फोर्स साहित्य की ओर मुड़ जाये तो फिर क्या कहने हैं। और तुम--?

क्या मैं भूल गया हूँ तुम्हें? इस जन्म में तो शायद गंगा, मुक्त और बेनीपुरी--त्रिदेवों को भूल नहीं सकता, पर-जन्म की राम जाने!"...

समय साक्षी है, वियोगीजी ने अज्ञेयजी के लिए जो शुभेच्छा 1940 के पत्र में प्रकट की थी, कालांतर में वही सत्य सिद्ध हुई।... 'मेघमण्डल' के मित्र, 'बिजली' के लेखक-कविगण का सहयोग-समर्थन भी पिताजी को मिला और सबसे बड़ी बात, एक-दो अंक के प्रकाशित होते ही उन अंकों को देखकर देशरत्न डाॅ. राजेंद्र प्रसादजी ने पत्र लिखकर पिताजी को सदाकत आश्रम में मिलने का आदेश दिया। यथासमय पिताजी उनसे मिले और पहली मुलाकात में ही राजेंद्र बाबू ने 'आरती' को अपने संरक्षण में लेने की कृपा की। 'आरती' की थाली जगमगा उठी।




उस मुलाक़ात में राजेंद्र बाबू ने कहा था--"आरती' देश में बिहार का गौरव बढ़ायेगी। इसका प्रकाशन अवरुद्ध नहीं होना चाहिए।" पिताजी बहुत उत्साहित और प्रसन्नचित्त सदाकत आश्रम से लौटे।

पटना सिटी की पतली-सी कचौड़ी गली में आरती मन्दिर प्रेस की स्थापना कर पिताजी वहीं रहने लगे और वहीं से निकलने लगी 'आरती'। कालान्तर में उसी भवन में 'संगीत सदन' स्थापित हुआ। 'आरती' के दरबार में कौन नहीं आया! दिग्गज साहित्यिक आये तो नयी पीढ़ी के साहित्य प्रेमी भी। स्थानीय नवयुवक मण्डल के जिज्ञासुु प्रतिनिधि तो सुबह-शाम 'आरती' की लौ को अंजुरी में उठाकर अपने मस्तक से लगाने को तत्पर रहते, उनमें प्रमुख थे स्व. गिरिधारीलाल शर्मा 'गर्ग', स्व. रामजी मिश्र 'मनोहर, स्व. नारायण भक्त, स्व. सत्यदेव नारायण सिन्हा आदि। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि बिजली-आरती के युग में पीढ़ियाँ दीक्षित हुईं।...

'दिनकर की डायरी" के संयोजन-काल (अप्रैल-मई 1972) में, दिनकरजी के कक्ष में रखे बड़े-से लोहे की चादरवाले बक्से से जब पिताजी के 1936-40 के लिखे चार पत्र मेरे हाथ लगे तो उन्हें पढ़कर मैं रोमांचित हो उठा था। उन पत्रों को दिखाकर जब मैंने उनसे बातें कीं तो उन्होंने मुझसे कहा था--"मेरी कई प्रारंभिक रचनाएँ मुक्तजी ने ही 'बिजली' और 'आरती' में प्रकाशित की थीं। यह उसी समय का पत्राचार है।"... 30-35 वर्ष पुराने उन खतों में पिताजी के मोती-से अक्षर सर्वथा सुरक्षित कैसे थे, यही आश्चर्य का विषय था।

अतिशीघ्र 'आरती मन्दिर प्रेस' बड़ी-बड़ी साहित्यिक विभूतियों का रमणीय स्थल बन गया। अज्ञेयजी-बच्चनजी का वहाँ आना-जाना तो होता ही था। सुधीजन उनके दर्शन कर मुग्ध-विस्मित होते। बच्चनजी के काव्य-पाठ की गोष्ठियाँ होतीं। 'मधुशाला' के छंद सुनकर श्रोता झूम-झूम जाते और गहरी संपृक्ति से काव्य-सुधा का पान करते रहते। पिताजी के समवयसी और बुजुर्ग मित्र, जो उन दिनों पटना में थे, वे भी साथ आ जुटते। ऐसी संगोष्ठियों, सम्मेलनों और काव्य-पाठ से पटना शहर में साहित्यिक सरगर्मियाँ तेज हुईं, नवयुवक पढ़ने-लिखने की ओर प्रवृत्त हुए, एक नया माहौल बनने लगा।...
[क्रमशः]