गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

[एक विस्तृत परिभ्रमण कथा]
[यात्रा-वृत्तान्त]

इन्द्रलोक-सा गोवा : जितना भव्य, उतना ही मदहोश...

एक सप्ताह का गोवा-प्रवास अतिशय आनन्ददायी था। पुणे से गोवा आठ घण्टों का निरंतर सफ़र था, चार चक्रवाहिनी से। 4 मार्च की सुबह 7 बजे हमने प्रस्थान किया। मेरे तीन हमसफ़र थे--मेरी धर्मपत्नी, मेरी छोटी सुपुत्री और उनके मित्र हाशिम भाई ('कौन बनेगा करोड़पति' से प्रसिद्धि-प्राप्त 'सज्जनजी')।
हम सब प्रसन्न-मन चल पड़े गन्तव्य की ओर--रुकते-ठहरते, चाय-नाश्ता करते और म्यूजिक सिस्टम पर संगीत-श्रवण करते हुए। राष्ट्रीय राजमार्ग की यात्रा करते हुए जब हम निपाणी (कर्णाटक) पहुँचे तो मुझे अपने बिछड़े हुए एक मित्र 'मालपाणी' की नाहक याद आयी। नाहक इसलिए कि अगर उसकी याद न आयी होती तो हम सीधे राजमार्ग की बाँह थामे आगे बढ़ जाते, निपाणी में रुकने की वजह से हमारा यात्रा-मार्ग बदल गया और हम इकहरी तथा सँकरी सड़क पर मुड़ गये, जो राज्यमार्ग (निपाणी-अजरा लिंक रोड) था। सड़क के पार्श्व भाग में दोनों ओर छोटे-छोटे गाँवों और जले-भुने खेतों का दर्शन करते हुए हमारी गाड़ी अचानक एक ऊँचाई से नीचे उतरती जान पड़ी। और देखते ही देखते ढलान तीखी और सर्पिल होती गयी। उस पर वाहनों की आवाजाही भी कम न थी और कार-चालक हाशिम साँसत में पड़े हुए थे। कार-चालन का उन्हें पर्याप्त अनुभव तो था, लेकिन पहाड़ी मार्गों और घाटियों में उन्होंने अधिक भ्रमण नहीं किया! वह सहमते-सकुचाते सतर्कता से कार को संकुचित चाल से चलाते रहे। तीखे मोड़, गहरी ढलान और रपटों को रौंदती कार चली जा रही थी और वह भयप्रद घाटी खत्म होने का नाम न लेती थी। एक-दो तीखे मोड़ ऐसे भी गुज़रे, जब मन में आया कि कार का संचालन अपने हाथ में ले लूँ, लेकिन आगे-पीछे दौड़ते वाहनों और इकहरे मार्ग के कारण इसका भी अवकाश नहीं था। हमारे पीछे के वाहन हाॅर्न बजाते हुए तीव्र गति से चलने का संकेत दे रहे थे और मैं इस संकोच से ग्रस्त था कि वाहन को मेरे संचालन का अभ्यास नहीं था। मुझे डर था कि मैं उसे जिस दिशा में बढ़ने का आदेश दूँ, वह उधर न बढ़कर दूसरी दिशा में बढ़ चले तो?...

हम सभी सूखते हलक के साथ अपनी-अपनी सीट पर स्थिर थे। म्यूजिक सिस्टम में लगा पेन ड्राइव एक-के बाद दूसरा गीत धीमी आवाज़ में सुनाता जा रहा था, तभी रफ़ी साहब का एक पुराना गीत बज उठा--'दिल में छुपा के प्यार का तूफ़ान ले चले, हम आज अपनी...' इस गीत ने इतनी ही यात्रा की थी कि पीछे से छोटी बेटी का हाथ डैश बोर्ड तक आया और रफ़ीजी की खनकती आवाज़ को शांत कर गया। कोई कुछ बोला नहीं, किसी ने आपत्ति दर्ज़ नहीं की। जब हर मोड़ पर संकट सम्मुख खड़ा हो तो कौन अगली पंक्ति सुनने का साहस करता--'हम आज अपनी मौत का सामान ले चले!' प्राण-संकट हो तो संसार का हर प्राणी मन से कितना भीरु होता है न...!

लेकिन सज्जन भाई पूरी सावधानी और मंथर गति से घाटी से प्रायः आधे घण्टे तक उतरते ही रहे और अंततः हमने एक शिला पर लिखा वाक्य पढ़ा--'अंबोली घाट समाप्त'। इस वाक्य ने हमें कितनी राहत दी, यह कहने की आवश्यकता नहीं। लेकिन भयाक्रांत इस भ्रमण ने वन-वीथियों का अप्रतिम सौंदर्य, उच्चावच मार्गों से दीखती विशाल वन-संपदा और सूर्यास्त-दर्शन का अलभ्य अवसर हमसे छीन लिया।...

घाटी के बाद भी घण्टे भर की यात्रा शेष थी। शाम के चार बजने के कुछ पहले ही हम गोवा के मरकत मणि-तट पर जा पहुँचे। समुद्र-तट के किनारे सी पैराडाइज़ बीच हट्स, मैण्ड्रम में हमने ठहरने का निश्चय किया और काॅटेज को प्रतिदिन के किराये पर ले लिया एक सप्ताह के लिए। काॅटेज को 'पर्णकुटी' कहूँ तो अत्युक्ति नहीं होगी। बाँस की तीलियों-खपच्चियों और छोटे-बड़े टुकड़ों से बना सुन्दरतम काॅटेज, जहाँ सुख-सुविधाओं का सारा प्रबंध था। लहराती समुद्री हवाएँ सुखदायी थीं। हमने वहीं शरण ली, चाय पी और तत्काल सूर्यास्त-दर्शन के लिए समुद्र-तट पर जा पहुँचे। वहीं विशाल समुद्र का दिव्य दर्शन हुआ।...
समुद्र-तट पर देसी-विदेशी पर्यटकों की भीड़ थी, अपार श्वेत बालुका राशि थी, शेड में अर्द्धशयन मुद्रावाली गद्दीदार बेंचें बिछी दीं। चंचल शोख़ हवाएँ थीं। वहाँ पहुँचते ही मात्र आधे घण्टे में यात्रा की थकान मिट गयी और देह फरहर हो उठी। परमानंद हुआ वहाँ और समुद्र-तट पर ही रात का भोजन कर हम लौट आये।...पहुँचवाला पहला दिन बीत गया।...



'कथा दिवस की खत्म हो गई, विश्राम करें श्रीमान्।
फिर से आवें इसी पटल पर, पढ़ें नया व्याख्यान!!'
(क्रमशः )

शनिवार, 10 मार्च 2018

गोआ के सागर-तट से...

मित्र सागर !
तुम्हारे विस्तृत भीगे सैंकत श्वेत कणों पर
मैं छोड़ रहा पद-चिह्न...!
सागर के उन्मद ज्वार
तुम जब चाहो, मिटा जाना उन्हें...!
मैं लौटूंगा युग-युगान्तर बाद कभी
जाने कौन-सी मौजों पर होकर सवार।
यह यायावर, मतवाला मन
फिर जाने कब
डाले पग-फेरे इसी राह पर
रजत-कणों पर चलते-चलते...

रे उद्दण्ड लहरों के रखवाले सागर !
तुम फिर मिटा देना उन्हें
मैं आ जाऊँगा फिर-फिर...
यही अनवरत, अविराम श्रम
हम दोनों करेंगे...
जीवन की शाश्वत कथा
इसी रेत पर हम लिखेंगे...!
जीवन के इस महाकाव्य में
नहीं होता कहीं पूर्ण विराम मित्र....
👣👣👣



(--आनन्द. 10.03.2018)

सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

जख़्म फिर हरा हो गया...

फिल्म 'माॅम' की कलानेत्री श्रीदेवी के हठात् मौन हो जाने से सारा संसार स्तब्ध है और कई ऐंगल से उनकी अचानक हुई मौत पर विचार कर रहा है। टीवी के तमाम चैनलों पर यही चिंता कल से व्यक्त हो रही है कि ऐसा कैसे हो गया?...

मैं अपने अनुभव से जानता हूँ कि ऐसा भी होता है। काल कभी भी, कहीं भी दबे पाँव आ धमकता है और जीते-जागते, हँसते-गाते, ख़ुशदिल इंसान की धड़कनें बंद कर जाता है। श्रीदेवी भी उसी क्षिप्र कालगति का ग्रास बन गयी हैं, जिसकी शिकार मेरी माँ हुई थीं कभी।...
फिर 4 दिसम्बर, सन् 1968 याद आया, जिसके ब्राह्म मुहूर्त में मेरी माँ के दिल की धड़कनों को भी काल ने गिरफ़्तार कर लिया था--औचक! 3 दिसम्बर 68 की शाम तक वह दफ़्तर में थीं। तमाम संचिकाओं के निबटारे के बाद बाज़ार गयी थीं। दूसरे दिन एकादशी थी। प्रत्येक एकादशी पर सत्यनारायण भगवान् की कथा-श्रवण का उनका नियम था। उन्हीं के पूजन के लिए वह बाज़ार से खरीद लायी थीं फल और हवन-सामग्रियाँ, साथ में श्रीराम-जानकी और भजन-मग्न पवनसुत हनुमान की फ्रेम में मढ़ी हुई तस्वीरें। वह पूर्णतः स्वस्थ और प्रसन्नचित्त थीं। तब कौन जानता था कि कल का सूर्योदय वह देख न सकेंगी?

विवाह समारोह में पूरी हार्दिकता और प्रसन्नता से शामिल होनेवाली श्रीदेवी को भी कहाँ ज्ञात था कि कल का सूरज उनके दर्शन के लिए नहीं निकलेगा? इस स्तम्भित कर देनेवाले आघात को खूब पहचानता हूँ मैं! जब हम बच्चों ने अपनी माँ को खोया था, तब हम चारों भाई-बहन टीन एजर्स ही थे। माँ स्वदेश में ही, किन्तु घर से दूर थीं। श्रीदेवी की दोनों बेटियाँ भी उसी आयु-वर्ग के आसपास की हैं आज। पाँच-छह घण्टों की यात्रा कर हम माँ के पास तो कहाँ, उनके पार्थिव अवशेष तक पहुँच गये थे, लेकिन श्रीदेवी की बेटियों को तीन दिनों से माँ का नहीं, उनके शव-दर्शन की विह्वल प्रतीक्षा करनी पड़ रही है और दुनिया है कि नियमों-विधानों की उलझी सुलझाने में लगी है। माँ तो अनन्त की यात्रा पर चली गयीं हैं, उन्हें तो अब आना नहीं है कभी...! आना है शव को, डेड बाॅडी को, पार्थिव अवशेष को...! यह मान लेना भी कितना कठिन है, त्रासद और दुःखद है...!

जानता हूँ, संपूर्ण ब्रह्माण्ड की समस्त गतिविधियों के हठात् रुक जाने-जैसी और स्तब्ध कर देनेवाली घड़ी है यह...! ऐसी मर्मान्तक, स्तब्धकारी और जड़ कर देनेवाली पीड़ा का भुक्तभोगी हूँ मैं भी, मेरा पूरा परिवार भी। संवेदना-सांत्वना का कोई भी शब्द पीछे छूट गये परिजनों की इस पीड़ा का शमन नहीं कर सकता। यह अवसाद आजीवन सालता रहेगा अब।...

श्रीदेवी के महाप्रस्थान से वह पुराना जख़्म फिर से हरा हो गया है।... बस, इतना ही कह सकूँगा अभी।...

(--आनन्द. 26-02-2018)

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

नहीं तो शामत सिर पर आई...!

[एक अनावश्यक कविता]

ये जो पत्नियाँ होती हैं न,
मुझे लगता है,
कठिन सामग्रियाँ होती हैं;
इसी वजह से मैं
अपनी गृहलक्ष्मी को
'तथाकथित पत्नी' कहता हूँ ।
लोग कहते हैं, इसलिए 'पत्नी',
अन्यथा वह तो हवा की एक
ख़ुशनुमां बयार-सी है
जो मेरे साथ-साथ चलती है,
मेरे मिज़ाज के हिसाब से
अपना रंग बदलती है।

जनाब! यह भी आसान
कलाबाज़ी नहीं है
कि मुस्कान देखकर
मुख-कमल खिल उठे
या बिगड़े हों मेरे तेवर
तो मुख-चन्द्र मलिन हो जाये;
जैसे पूर्ण चन्द्र पर आ जाता है
टुकड़ा-टुकड़ा काला बादल,
लेकिन यह दृश्य तभी तक स्थिर
या गतिमान होता है,
जबतक घर में कोई विकट गतिरोध नहीं होता
कोई भी अपना आपा पूरी तरह नहीं खोता!

हुई असावधानी जरा-सी
घटना घटी बड़ी-सी,
और ऐसे में--
जब कभी उनका भेजा पलटता है
हवाओं का रंग बदलता है,
सुरमई शाम भी
स्याह रात में ढल जाती है
जो सोना चाहूँ तो
नींद नहीं आती है।

स्वाभिमान का दीपक बुझाकर
आँखों में नकली नमी का सुरमा लगाकर
करनी पड़ती है मनुहार मुझे
फिर भी दी जाती है
लानत और फटकार मुझे।...

सब सहना होता है मुझको
ताकि अगली तिमाही तक
शांति से चलता रहे मेरा शासन,
मेरी भाव-भंगिमा और
भृकुटी के संचालन से
रहे काँपता घर का आँगन ।...

भई, सीधी-सी बात है
ये तनी हुई अभिमानी गर्दन भी
ठीक वहीं पर झुकती है
जहाँ शिवाला है कोई
या शक्तिपीठ की ड्योढ़ी है।
जग्गजननि के सम्मुख क्या
कोई तनकर खड़ा रह सकता है
जगत्-प्रवाह में बहता तिनका
कब तक थिर रह सकता है?
इन सिद्धपीठों पर जाकर
जो बावला ऐंठा ही रह जाता है,
वह जीवन के महासमर में
हतबुद्ध खड़ा रह जाता है।...

इन फूलों का क्या है बंधु,
जंगल-जंगल खिल जाते हैं,
उपवन में वे ही तो आखिर,
नया गुलाब ले आते हैं।
नतशिर होना होता है भाई
नहीं तो शामत सिर पर आई...!..

[चित्र : हमारा, : व्यथा बगल के किरायेदार की]
--आनन्द, 19-12-2017

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

एकाकी होगी अन्तर्यात्रा...

जब, जहाँ से उठूँगा,
वहीं से चल दूँगा...!
जरूरी नहीं होता
चलने के लिए सड़कें नापना;
अन्तःप्रदेश के विभिन्न रास्तों पर भी
दौड़ा जा सकता है--बेधड़क!
मन के चंचल अश्व की भी
की जा सकती है सवारी,
चहुँओर दौड़ाया जा सकता है उसे,
विभिन्न लोकों की
हो सकती है सैर निर्विघ्न;
लेकिन, जरूरी है, बेहद जरूरी है,
अपने अंकुश में रखा जाए मन के घोड़े को
यह तुरंग बहुत वेगवान होता है,
बेलगाम हुआ तो
तुम्हें न जाने कहाँ ले जाए,
किस दलदल में पटक दे
या किस गर्त्त में गिरा दे
अथवा किस नरक में पहुँचा दे, नामुराद!

मानता हूँ,
मेरे-तुम्हारे मन का एका है
गहरा जुड़ाव है,
अटूट संपृक्ति है हमारी;
लेकिन, तुम चाहो भी तो इस यात्रा पर
मेरे साथ नहीं चल सकते प्रिय !
यह अन्तर्यात्रा तो होती है एकाकी--निःसंग
और वह अधिकतर होती तभी है
जब निष्क्रिय होकर शय्याशायी हो जाना पड़े
प्रायः एक पखवारे के लिए..!

हाँ, यह हो सकता है,
तुम अपनी यात्रा पर निकलो
मैं अलग, निःसंग अपनी यात्रा पर,
लेकिन देखना--
अपने विवेक-बल के सबल हाथों में
कसकर थामे रहना लगाम
उस उद्दण्ड
और चंचल मन के अश्व की,
निरंकुश मत होने देना उसे।
जो लोग ऐसा नहीं कर सके हैं
देखो, अपने आसपास
कितने लोग अपना अर्जित यश
धूमिल कर पकेपन में
यातनाएं भोगने और
सिर धुनने को विवश हैं!

अगर तुम ऐसा कर सके,
तब देखोगे--
लंबी दूरियाँ तय करके
हम लौट आये हैं वहीं,
जहाँ से उठकर चल दिये थे--हठात्!

इसी भाव-भूमि पर,
स्वप्न के सत्य से छूटकर
हम फिर मिलेंगे जरूर
एक दिन... प्रिय...!

[--आनन्द. 24-01-2018.]

रविवार, 11 फ़रवरी 2018

लालटेन का शीशा साफ हुआ...

पुराने ज़माने में गाँव-देहात में देर शाम होते ही जो लालटेन बुझने लगती थी, लोग उसे बुझाकर एक किनारे रख देते थे। कौन उसके शीशे साफ करे, मिट्टी का तेल भरे? ये जहमत उठाने से सो जाना लोग बेहतर समझते थे, लेकिन अब वक़्त बदल गया है। लालटेनें अब प्रचलन में रहीं नहीं। शहर तो शहर अधिकांश गाँवों से भी गायब हो गयी हैं लालटेनें।

लेकिन, ज़िन्दगी की राहों को रौशन करने के लिए नासिका के ऊँचे टीले के दोनों ओर जलती-बुझती रहती हैं दो-दो लालटेनें। किन्तु इन लालटेनों का विधान कबीर की उलटबांसियों की तरह ही उलटा है। दिन के उजाले में ये जलती हैं और रात होते ही स्वयमेव बुझ जाती हैं। इन्हें जलाना-बुझाना नहीं पड़ता। इन लालटेनों को हम आँख, नयन, नेत्र आदि कहते हैं। वैसे, यह भी कहा गया है--'नयन जरै दिन रैन हमारे'। सच है, ये लालटेनें जलती तो रहती हैं दिन-रात, लेकिन इनका जलना-बुझना स्वचालित है। इन लालटेनों का स्विच होती हैं हमारी पलकें। पलकें बंद हुईं और स्वतः बुझ गयीं लालटेनें। पलकें खुलीं तो रौशन हो उठीं लालटेनें।

नयनों के अत्यधिक उपयोग से या अनियमित शयन-जागरण से या अनुचित खानपान से इन लालटेनों पर कालिख-सी पुत जाती है, जिसे आंग्ल भाषा में कहते हैं कैटरेक्ट और देसी भाषा में मोतियाबिंद! सैंतीस वर्षों से मैं भी तम्बाकू का सेवन करता रहा हूँ और अक्षरों से खूब फोड़ी हैं आँखें, रात-रात-भर जागकर। भोजन की अनियमितता मेरी जीवनचर्या रही थी। मेरी लालटेन पर कालिख तो आनी ही थी, आयी। जब बहुत परेशानी होने लगी तो मैंने शल्य क्रिया का निर्णय लिया।

मुझे याद आया, यह कष्ट पिताजी को भी हुआ था। मैंने जब से उन्हें देखा था, चश्मे में ही देखा था। अपने चौथेपन में उन्होंने अपनी एक आँख की शल्य क्रिया अलीगढ़ अकेले जाकर प्रख्यात चिकित्सक डाॅ. पाहवा से करवायी थी। पन्द्रह दिन अस्पताल में रहे थे और अनेक कष्ट उठाये थे। पन्द्रह दिनों के बाद एक आँख पर हरी पट्टी बँधवाये वह दिल्ली गये थे और अपने अभिन्न मित्रों सर्वश्री बच्चन, जैनेन्द्र कुमार और अज्ञेयजी से मिलकर पटना लौटे थे। तीन महीने के औषधोपचार के बाद उनकी आँख काम करने लायक हुई थी, मोटा पावर ग्लास लगाकर...!

अब, जब मेरी बारी आई तो मैंने भी अपने बच्चों को अपनी-अपनी व्यस्तताओं से हाथ खींचकर भाग-दौड़ करने से मना कर दिया और श्रीमतीजी के साथ पुणे के रूबी हाॅस्पिटल पहुँच गया। 17 जनवरी की सुबह वहाँ डाॅक्टर नरियोसन एफ. ईरानी ने मेरी बाईं आँख का लेजर ऑपरेशन किया और मात्र 20 मिनट में मुझे फ़ारिग कर दिया। दो घण्टे अपनी निगरानी में रखने के बाद उन्होंने मेरी आँख की पट्टी भी हटा दी और काले चश्मे में घर भेज दिया। 21 दिनों की औषधियों और तमाम परहेजों-सावधानियों के बाद पावर का नया चश्मा मुझे मिल गया है और दुनिया फिर से रौशन हो गयी है।

बदलते वक्त के साथ यह आॅपरेशन बहुत आसान हो गया है। सौभाग्य से मुझे युवा डाॅक्टर ईरानी भी ऐसे मिले, जो मित्रवत् व्यवहार करते थे। पूरी शल्य क्रिया के दौरान वह मुझसे बातें करते रहे और मुझे तनिक भी पीड़ा नहीं हुई। मेरी नासिका के बायीं ओर रखी लालटेन का शीशा उन्होंने ऐसा चमकाकर साफ कर दिया है कि दुनिया रौशन हो उठी है, दृश्य उछलकर नेत्र-पट पर नृत्य करने लगे हैं और अक्षर अब स्थिर भाव में खड़े मिलते हैं; उनमें लेशमात्र का कंपन नहीं होता। दीन-दुनिया का तो पता नहीं, लेकिन लगता है, मेरे तो अच्छे दिन आनेवाले हैं!... खूब लिखूँगा-पढ़ूंगा और स्पष्ट दूर-दर्शन करूँगा।

एतदर्थ, मृदुभाषी आत्मीय चिकित्सक डाॅ. ईरानी का बहुत-बहुत आभार!
--आनन्द. 10 जनवरी, 2018.

[चित्र : डा. नरियोसन एफ. ईरानी के साथ मैं. 7-11-2018]

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

'दोनों के बीच मैं ही फाड़ा जाऊँगा'...?

हम एक ही वर्ष में, लेकिन दो अलग-अलग शहरों, परिवारों और परिवेश में जन्मे थे। हमारा पालन-पोषण और पठन-पाठन भी भिन्न शहरों में हुआ था। युवावस्था की दहलीज़ पर पाँव रखते ही संयोगवश हम मिले, मित्र बने और हमारी गहरी छनने लगी। मित्रता घनिष्ठ से घनिष्ठतर होती गयी। लेकिन हमारी रुचियाँ भिन्न थीं। हम अलग पथ के पथिक थे। न बोध-विचार का साम्य था, न प्रकृति समान थीं। दो अलग धारा में बहनेवाले प्राणी थे हम दोनों।...
वह गम्भीराचार्य था, मैं मुक्त मन का मुखर युवा! वह बाॅडी बिल्डर था, मैं कोमल मन का संवेदनशील युवा-कवि! लिखने-पढ़ने और साहित्य से उसका कोई वास्ता नहीं था। हमारी मनोरचना में भिन्नता बहुत थी। लेकिन, मित्रता शायद शर्तों पर नहीं होती, वह होती है; क्योंकि उसे होना होता है--विधिवशात्। हमारा साथ-संग दीर्घकालिक नहीं रहा, लेकिन मित्रता अक्षुण्ण रही और आज भी यथावत् है। जब तक मैं उसके साथ रहा, शाम होते ही मैं टेबल टेनिस खेलने क्लब चला जाता और वह वर्कआउट करने के लिए जिम। लौटता तो वह भर-कटोरा अंकुरित चना खाता और मैं अपने लिए काॅफ़ी बना लेता।

वह मित्रता का धर्म निभानेवाला शेरदिल इंसान था--मुंहफट, लेकिन स्वच्छ हृदय का। मुंहफट तो था, मगर जो बात उसे न बतानी होती, उसे उसकी ज़बान से कोई उगलवा भी नहीं सकता था। अपने मान-स्वाभिमान की बहुत फ़िक्र थी उसे। अभिमान उसमें बिल्कुल नहीं था, लेकिन स्वाभिमान प्रचुर मात्रा में था। उसका गठीला बदन और आकर्षक व्यक्तित्व हमारे लिए आदर्श बना रहा। मुख़्तसर में कहूँ तो वह एक अत्याधुनिक सुदर्शन पहलवान सरीखा नवयुवक था।...

साथ रहते दो वर्ष भी न गुज़रा था कि हम दोनों के परिवारों में हमारे विवाह की चिंता और चर्चा होने लगी। तब विवाह के लिए न मैं तैयार था, न मेरा पहलवान मित्र। लेकिन घर के बड़े-बुजुर्गों को रोकनेवाला भला कौन था? वे अपनी मनमर्जी चलाते रहे और हम उनकी आज्ञा मानने को विवश बने रहे। मेरे पट्ठे मित्र ने तो अपने घरवालों को दो टूक कह दिया था--'अभी नहीं करनी शादी-वादी...!' लेकिन विधि को यह मंजूर नहीं था। एक कन्या के पिता को अपनी पढ़ी-लिखी योग्य बिटिया के लिए मेरे पहलवान मित्र बहुत पसन्द आ गये थे। वह उसके पिताजी के घर के चक्कर लगाने लगे। बात बढ़ी तो बढ़ती चली गयी। नतीजा यह हुआ कि मित्रवर को न चाहते हुए भी कन्या-निरीक्षण के लिए घर जाना पड़ा। वह बड़ों की आज्ञा की अवहेलना न कर सके। वह ज़माना ऐसा था भी नहीं। जब वह लौटा तो मेरे बार-बार पूछने पर बमुश्किल इतना ही कह सका--'लड़की तो ठीके है।' उसका इतना कहना ही काफी था, मेरे चिकोटी काटने के लिए। मैं उसे जब ज्यादा परेशान करता तो एक रहस्यमयी मुस्कान उसके अधरों पर खेल जाती। कुछ महीने और बीत गये, अंतिम निर्णय का कुछ पता न चला। लेकिन बीतते वक्त के साथ अंदेशा होने लगा था कि बात यहीं बनेगी। चुप्पा पहलवान इस विषय पर ज्यादा कुछ बोलता ही नहीं था।...

एक दिन शाम के वक़्त, जिम जाने के ठीक पहले, जब वह मेरे सामने पड़ा तो शुभकामना-संदेश का एक कार्ड मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोला--'ये देखो!'
मैंने पूछा--'क्या है?'
अनासक्त भाव से बोला पहलवान--'खुद ही देख लो, उसी लड़की की शुभकामनाएँ हैं।' इतना कहकर हल्की मुस्कान के साथ वह जिम चला गया और उत्सुकता से भरा मैं लिफ़ाफ़ा खोलकर देखने लगा। उसमें एक मुद्रित कार्ड था और हस्तलिखित एक छोटा-सा पत्र! कन्या का प्रथम पत्र पढ़कर मेरी पहली प्रतिक्रिया यही हुई कि कन्या तो सुबुद्ध है!

अब संकट पहलवान के पाले में था। मैं रोज उससे पूछता--'पत्र का उत्तर दिया?' वह मुस्कुरा कर प्रश्न टाल जाता, लेकिन उसकी मुस्कुराहट में ही उसकी पसंदगी का रहस्य छिपा था। एक दिन मैं उसके पीछे ही पड़ गया। मैंने कहा--'कमाल करते हो तुम भी यार! वह लड़की होकर तुम्हें शुभकामनाएँ भेजने और पत्र लिखने का साहस दिखा सकती है और तुम उत्तर देने की हिम्मत भी नहीं जुटा रहे, कितनी गलत बात है। तुम्हें भी तो कुछ लिखना चाहिए न!'
उसने खीझकर कहा--'ये चिट्ठी-पत्री मुझसे न होगी।' बहुतेरी जिरह के बाद, आखिरश मैंने उसे मना ही लिया कि उत्तर मैं लिख दूँगा और वह उसे अपनी हस्तलिपि में यथावत् उतार कर पोस्ट कर देगा। और, यह राज़ मेरे-उसके बीच पोशीदा ही रहेगा ताज़िंदगी।...

जिस शाम उसकी स्वीकृति मिली, उसी रात मैं पत्र लिखने बैठा और सोचता रहा क्या लिखूँ, कैसे लिखूँ? किसी दूसरे के लिए ख़त लिखना कठिन था और वह भी ऐसे बनते हुए नवीन संबंध के नाम! किसी के लिए प्रेम (जैसा)-पत्र लिखने का मेरे जीवन में भी यह पहला ही अवसर था। क्या कहूँ, कठिन परीक्षा थी। बहुत देर तक चिंतन करने के बाद भी एक शिष्ट और स्नेहिल संबोधन के अतिरिक्त मैं कुछ न लिख सका। कागज़-कलम मेज़ पर छोडक़र मैंने शय्या की शरण ली।...
मैं लेटकर निद्रादेवी का आह्वान करने लगा, लेकिन नींद थी कि आती नहीं थी। मैं सोचने लगा कि अगर ऐसा ही एक पत्र मुझे अपनी भावी पत्नी को लिखना होता तो मैं क्या लिखता? इस विचार ने शब्द देने की शुरूआत की और उन शब्दों से वाक्यों का निर्माण होने लगा। मैं बिस्तर छोड़कर पुनः टेबल पर आ गया और लिखने लगा। भावी पत्नी को संबोधित करते हुए जो भाव-विचार मन में उपजने लगे, जितने रंग मनःलोक में भरने लगे, उन्हें शिष्ट शब्दों में पिरोकर मैं काग़ज पर फैलाता गया। और, देखते-देखते एक सुन्दर शब्द-चित्र तैयार हो गया, जिसे पढ़कर मैं स्वयं संतुष्ट हुआ।... उसी की प्रतिलिपि मेरे बलशाली मित्र ने अपनी भावी पत्नी को प्रथम पत्र के रूप में लिख भेजी।

कुछ दिनों के बाद कन्या का उल्लास से भरा दूसरा ख़त आ पहुँचा। पहलवान ने दूसरा ख़त भी मेरी ओर उछालते हुए कहा--'लो, यह नंबर टू है। अब झेलो।'... दूसरे ख़त में रस-माधुर्य अधिक था। पत्र पढ़कर मुझे आनन्द-लाभ हुआ। पत्र, मेरे लिखे पत्र के आलोक में लिखा गया था और उसमें मेरे लिखे शब्दों की प्रशंसा भी थी। मन पुलकित हुआ।...
मैंने दूसरे ख़त का भी अपने जानते ख़ासा अच्छा उत्तर लिखा--तब जितनी विद्या-बुद्धि थी, सबका उपयोग करते हुए। पन्द्रह-अठारह दिनों बाद तीसरा ख़त भी आ पहुँचा, जिसे मेरी ओर बढ़ाते हुए दबंग मित्र को अंततः कहना ही पड़ा--'अरे यार, तुमने तो मेरी बड़ी अच्छी इमेज बना दी है वहाँ...।'

लेकिन तीसरे ख़त का उत्तर देते ही मुझे बलवान मित्र की संगत से रुख़सत हो जाना पड़ा। इसके साल-भर बाद दिल्ली में मेरा विवाह हुआ और उसके कई महीनों बाद पहलवानजी का भी--उसी कन्या के साथ, जिसे मैं तीन प्रेमपूर्ण पत्र लिख आया था।...

हम संघर्षपूर्ण जीवन जीते हुए अपनी-अपनी राह लगे। वर्षों बीत गए। हम दोनों बाल-बच्चेदार हुए और शहर-दर-शहर भटकते रहे। जब मेरे बच्चे 3-5 साल के हो गये थे, तब एक दिन श्रीमतीजी ने मुझसे पूछा--'सुनिये, आप इतना पढ़ते-लिखते हैं। आपने विवाह के पहले कभी कोई पत्र क्यों नहीं लिखा मुझे? बस, दीपावली पर एक कार्ड भेजा था, जिसे मैंने आज तक सँजो रखा है।'
असावधानी में मेरे मुंह से बेसाख़्ता निकल गया--'मैंने पत्र लिखा तो था, पोस्ट कहीं और हो गया।'
मेरे इस उत्तर से श्रीमतीजी चकित रह गयीं और अन्तर्कथा बताने की ज़िद करने लगीं। विवश होकर मुझे सबकुछ खोलकर बताना पड़ा उन्हें। इस तरह मित्र के प्रति 'ब्रीच ऑफ़ ट्रस्ट' अनचाहे ही हो गया मुझसे। पूरी कथा सुनकर श्रीमतीजी ने ठंढी आह भरते हुए कहा था--'काश, वे ख़त कभी देखने को मिलते मुझे, आखिर लिखे तो थे मेरे लिए न...!'

कई वर्षों बाद प्यारे पहलवान मित्र से मिलने की राह मिली। हम मिले तो पुराने किस्से याद आये। मैंने मित्र से पूछा--'वह प्रारंभिक पत्राचार की बात अब तक परदे में ही है न?' अक्खड़ पहलवान बोला--'वह राज़ तो परदे चीरकर बाहर आ गया यार!'
मैंने पूछा--'वह कैसे? आख़िर तुमने भाभी को बता ही दिया न? जबकि हमारे बीच तय हुआ था, राज़ राज़ ही रहेगा।'
उसने कहा--'छोड़ो भी, जो हुआ, अच्छा हुआ। राज़ खुद ही फ़ाश होने को आमादा हो गया तो मैं क्या करता।' मैं समझ गया यह अकड़ू इसके आगे कुछ बतायेगा नहीं। दूसरे दिन मैं भाभी की शरण में गया और अचानक उनसे पूछ बैठा--'भाभी, वे शुरूआती चिट्ठयाँ कहाँ छुपा रखी हैं आपने, जो इसने लिखी थीं आपको? मैं भी तो देखूँ, क्या लिखा था इस दुष्टात्मा ने।'
भाभी तो जोरदार और निःसंकोची निकलीं। उन्होंने रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा--'छोड़िये भी... मुझे न बनाइए। मैं सब जानती हूँ, किसने लिखे थे वे ख़त।'
मैंने कहा--'जब आप जानती ही हैं तो अब संकोच कैसा? खोजकर दीजिए न चिट्ठयाँ।'
भाभी बोलीं--नहीं, संकोच कैसा? लेकिन, अब चिट्ठयाँ मैं दे नहीं सकती आपको।'
मैंने पूछा--'क्यों?'
वह बोलीं--'क्योंकि मैंने उन्हें फाड़कर नष्ट कर दिया है।'

उन प्रारम्भिक चिट्ठियों के नष्ट होने की जो कथा भाभी ने सुनायी, वह मुख़्तसर में यूँ थी कि गृहस्थी के किसी छोटे-से विवाद में बात बढ़ जाने पर भाभी ने उलाहना देते हुए पहलवान से गुस्से में कहा था--'अब आप मुझ पर चिल्लाने भी लगे हैं? पहले तो बड़े मीठे-मीठे पत्र लिखा करते थे...!'
क्रोध के वशीभूत पतिदेव भी तपाक में बोल पड़े--'अरे, उन चिट्ठियों की बात रहने भी दो। मैं थोड़े ही लिखता था चिट्ठयाँ! हऽ हहा, वो चिट्ठयाँ तो 'ओझा' लिखता था। मैं तो सिर्फ़ उसकी काॅपी करके भेज देता था तुम्हारे पास।'

इस उत्तर से भाभी को बड़ा क्रोध आया और उसी दिन उन्होंने चिट्ठयाँ फाड़कर फेंक दी थीं। इस तरह, सर्वप्रथम मेरे हृदय में उपजनेवाली कोमल भावनाओं का यह हश्र हुआ था, जो सूर्य की पहली किरण सरीखी नर्म थीं। ओह, वे आत्मीय उद्गार अब कभी पढ़ने को न मिलेंगे मुझे!... इस पीड़ा के साथ जब मैं सोने लगा तो पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह की एक क्षणिका अन्तर्मन में स्वयं ध्वनित होने लगी, जिसका शीर्षक था-- 'लिफ़ाफ़ा' :
'मजमून तुम्हारा और पता उनका,
दोनों के बीच मैं ही फाड़ा जाऊँगा।'
--आनन्द. 1 फरवरी 2018.