शनिवार, 18 नवंबर 2017

पाटलिपुत्र के सहित्याकाश में जब चमकी थी 'बिजली'...सजी थी 'आरती'...

बहुत तो नहीं, फिर भी एक लंबा अरसा गुज़रा पटना शहर (पटनासिटी) की गलियाँ छोड़े--जहाँ की गलियाँ वाराणसी की याद दिलाती हैं। प्रायः 40-42 साल पहले आठ वर्षों के लिए सिटी-प्रवासी बना था। उन आठ वर्षों के वक्त का हर लम्हा मेरे कलेजे में धड़कता है आज भी। ज़ेहन में करवटें बदलता है वह गुजरा हुआ ज़माना। स्मृतियों एक हुजूम है, जो चलचित्र की तरह चलता ही जाता है मन के निभृत एकांत में...! सोचता हूँ, ऐसा क्या ख़ास था वक्त के उस टुकड़े में, तो ख़याल आता है कि उस कालखण्ड ने न सिर्फ मेरा, बल्कि एक समूची पीढ़ी का कायाकल्प किया था, दिये थे संस्कार, बनाया था साहित्यानुरागी। मेरे साथ अतिरिक्त लाभ यह था कि मुझे जन्मना मिले थे साहित्य-प्रेम के स्फुलिंग। मैं श्रमजीवी, एकनिष्ठ, एकांत साधक-साहित्यकार और विद्वान् पिता (स्व. पं. प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त') का ज्येष्ठ पुत्र था। निःसंदेह, यह मेरा सौभाग्य था।...

गुरु गोविन्द सिंह की जन्म-स्थली होने का गौरव इसी पुण्यभूमि को प्राप्त है। गायघाट और तख़्त श्रीहरमन्दिर साहब के विशालकाय गुरुद्वारे अपनी नींव में उस गौरवशाली अतीत की अनेक गाथाएँ समेटे आज भी शान से खड़े हैं। पश्चिम में गायघाट का प्रसिद्ध गुरुद्वारा है तो पूरब में गुरु गोविन्द सिंहजी की बालक्रीड़ा स्थली है। यहीं मारूफगंज की बड़ी देवीजी का सिद्धासन है तो बड़ी और छोटी पटनदेवीजी भी यहीं विराजमान हैं। दक्षिण मे जल्ला के महावीरजी विराज रहे हैं तो अगम कुआँ का अलग महात्म्य है। और, उत्तर में जीवनदायनी वेगवती गंगा की धारा प्रवहमान् है। लोग श्रद्धावान् हैं, स्नेही हैं और परम आत्मीय भी हैं।

पटनासिटी कलावंतों, रससिद्धों, रसज्ञों-रसिकों, सेठ-साहूकारों की नगरी रही है। कालांतर में सुरों के साधकों, धुरंधर वादकों और ठुमरी-दादरा, टप्पा-तानों की मशहूर मलिकाओं ने इसी भूमि-भाग में अपना आशियाना बनाया। सुरों की रंगीन और हसीन महफ़िलें सजने लगीं यहाँ! राग-रागनियाँ इन्हीं आशियानों में महफ़ूज़ रहीं। बाल्यकाल में मैंने स्वयं अपनी आँखों देखे हैं उन आशियानों की बदहाली के दिन, जहाँ से उठती थीं कभी सम्मोहक और मारक तानें...! अपने ज़माने के जाने कितने हुनरमंद फ़नकार और अज़ीमुश्शान शानो-शौकत की फ़िरदौसों ने इसी ज़मीन से उठकर शोहरत की बुलंदियों को छुआ और यहीं ज़मींदोज़ हो गयीं। जाने कितने कलावंतों की चिताएँ यहीं जलीं और ठंडी हुईं।

यहाँ सबकुछ था--आध्यात्मिकता, कलानुराग, विरासतों को सँजोये रखने की तड़प और आपसी भाईचारा, प्रेम-सौहार्द, पहलवानी के अखाड़े और गली-चौबारों की रौनक; कमी थी तो साहित्यिक संस्कारों की, साहित्यानुरागियों की, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं की। बिहार तो वैसे भी पत्र-पत्रिकाओं के मामले में मरुभूमि-समान था। प्रख्यात शायर शाद अज़ीमाबादी (1846-1927) ने अपने युग में उर्दू अदब की शमा यहाँ खूब रोशन की, लेकिन हिन्दी साहित्य के सर्वाधिक पाठक बिहार में होने के बाद भी यह भूमि-भाग साहित्यिक रूप से सचेतन नहीं हुआ था। बीसवीं शती के तीसरे दशक में मेरे पूज्य पिताजी ने अपने ऋषिकल्प विद्वान् पितृश्री (साहित्याचार्य पं. चन्द्रशेखर शास्त्री) के निधन (1934) के बाद उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर को छोड़कर यहीं मालसलामी में बसना पसंद किया।

पिताजी ने अपने प्रयत्नों से यहीं से साप्ताहिक 'बिजली' नाम की एक साहित्यिक पत्रिका का संपादन-प्रकाशन, बर्मन एण्ड कंपनी के सहयोग से, 1936 ई. में आरम्भ किया। उन्होंने पटना के केन्द्र में अपने घनिष्ठ मित्र जनार्दन सहाय (कालान्तर में जिनके अनुज डाॅ. जितेन्द्र सहाय सुप्रसिद्ध नाटककार, व्यंग्यकार और संस्मरणकार बने) के साथ मिलकर साहित्यिक विमर्श की एक संस्था 'मेघमण्डल' की स्थापना की, जहाँ साहित्यानुरागियों की मण्डली जुटने लगी। दो वर्षों के प्रकाशन-काल में इस पत्रिका ने स्तरीय साहित्य के पठन-पाठन का ऐसा माहौल बनाया कि यह बंजर भूमि उर्वरा होने लगी। बिहार के निविड़ अंधकारमय साहित्याकाश में 'बिजली' ऐसी चमकी कि दिशाएं प्रकम्पित हुईं और आकाश उज्ज्वल प्रकाश से आलोकित हो उठा था। 'बिजली' ने स्थापित और सिद्ध साहित्यकारों की रचनाओं को स्थान दिया तो उदीयमान तथा नवोदित प्रतिभाओं को भी एक मंच प्रदान किया। एक ओर जहाँ महादेवी, निराला, पंत , प्रसाद, मैथिलीशरण, सियाराम शरण की रचनाएँ बिजली में छपीं, वहीं कवि बच्चन, नलिनविलोचन शर्मा, गोपालसिंह 'नेपाली', जनार्दन प्रसाद झा 'द्विज', हरेन्द्रदेव नारायण की लेखनी भी 'आरती' की आभा में चमक रही थी।...



प्रायः दो वर्षों के निरंतर प्रकाशन के बाद व्यावसायिक कारणों से 'बिजली' पद्मा, हजारीबाग में कड़कने चली गयी। पिताजी भी पद्मा गये और वहाँ के राजभवन में अतिथि बनकर रहे। उसी प्रवास में कई स्तरीय रचनाएँ उनकी कलम से कागज पर उतरीं। बिजली के खम्भे से बँधी गाय जब अपनी बछिया से बिछड़ गयी तो वह रात-भर आर्त्तनाद करती रही और खम्भे को उखाड़ फेंकने का संघर्ष करती रही। लेखक अपने घर के वातायन से उसका विलाप और संघर्ष देखते और मर्माहत होते रहे। दूसरे दिन सुबह के हल्के प्रकाश में विकल-विह्वल बाछी कुलाँचे भरती अपनी माँ के थन से आ लगी, इस दृश्य का मार्मिक और विचलित कर देनेवाला करुण विवरण जब उनकी लेखनी से कागज पर चित्रित हुआ और 'बिजली' में प्रकाशित हुआ तो हलचल मची थी। उसे पढ़कर टीकमगढ़ से पं. बनारसीदास चतुर्वेदीजी ने लिखा था--"आपकी कलम से गाय और बाछी की मनोवेदना, विकलता और विह्वलता साकार हो उठी है तथा पाठकों के मन को मथ देती है। ऐसी अन्य अनेक रचनाएँ हिन्दी में आनी चाहिए।"... किन्तु, आदेश से ऐसी रचनाएँ रूपायित नहीं होतीं। वैसी अनूठी मर्मवेधी रचना हिन्दी में दूसरी न आ सकी।...
[क्रमशः]

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

दीर्घकाय आलेख की लंबी प्रस्तावना...

[मित्रो ! सितम्बर के अंतिम सप्ताह में पटना से अग्रज श्रीनवीन रस्तोगी और मित्रवर कुमार दिनेश का सम्मिलित आदेश-आग्रह प्राप्त हुआ कि पाटलिपुत्र परिषद्, पटना की शीघ्र प्रकाश्य स्मारिका के लिए तत्काल कुछ लिखूँ। 1967-68 के इतने वर्षों बाद परिषद् से स्मारिका का प्रकाशन होनेवाला था। तत्कालीन स्मारिका में, जब अनन्तशयनम आयंगर बिहार के राज्यपाल थे, तब उनकी, मुख्यमंत्रीजी की शुभकामनाओं के बाद पूज्य बच्चनजी और पिताजी की सम्मतियाँ उसमें छपी थीं। संपादक-मण्डल का निर्णय था कि दीर्घावधि के बाद प्रकाश में आनेवाली प्रस्तावित स्मारिका में मुझ अकिंचन-अपदार्थ का भी कोई-न-कोई आलेख होना ही चाहिए। अग्रज का आदेश और मित्र की ज़िद ने लिखने को विवश कर दिया, लेकिन कई व्यवधान भी थे। मुझे दक्षिण की यात्रा पर निकलना था--तिथियाँ सुनिश्चित थीं, उनमें परिवर्तन असंभव था। मुझे लिखना है तो क्या लिखूँ, यह विचार भी तो करना था। वैसे, संपादक कुमार साहब से मुझे एक इशारा तो मिला था कि पाटलिपुत्र की पावन भूमि का यशोगान करते हुए साहित्यिक उन्नयन की गाथा लिखनी है मुझे और अतीत से वर्तमान तक चले आना है। दिमाग़ ने लेखन की योजना बनानी शुरू कर दी। अपनी आदत के अनुसार मैं अतीतोन्मुख हुआ। अपनी यादों के आसमान को खुरचते हुए मुझे कई रंग मिले--ऐसे रंग भी, जो मेरे देखे हुए नहीं थे। जीवनानुभवों से इतर सुनी-जानी और पढ़ी हुई गाथाओं के रंग बड़े शोख़-चटख लगे थे मुझे। मैंने उत्खनन जारी रखा और भावों को शब्दों में पिरोने लगा।...

मित्र-संपादक-द्वय द्वारा दी हुई समय-सीमा में आलेख लिखकर भेज देने की सख़्त हिदायत थी। पहली कड़ी घर रहते लिख गया, फिर यात्रा शुरू हुई।...और लेखन में व्यवधान पड़ा। आप यक़ीन करें, यह आलेख कई टुकड़ों में, अनेक पड़ावों में, एयरपोर्ट के वेटिंग लाउंज मे, हवाई जहाज की यात्रा में, बेटी-दामाद और नवासे के घर पहुँचकर ड्राइंग रूम में या एकांत कक्ष में अथवा सुबह-सबेरे बगीचे में निरंतर लिखता ही रहा। श्रीमतीजी को थोड़ी उजलत भी हुई कि अजीब-सा व्यवहार कर रहा हूँ मैं--इतने दिनों बाद मिले दामाद साहब से न ठीक से बात कर रहा हूँ, न नवासे ऋतज के साथ मिलकर अपनी प्रसन्नता का इज़हार कर रहा हूँ। वह मुझे अकेला देखकर आयीं और अपनी आपत्ति भी दर्ज कर गयीं। लेकिन वह मेरा स्वभाव जानती हैं। जानती हैं कि जब तक लेखन का यह भूत मेरे सिर से उतरेगा नहीं, मैं सामान्य और प्रकृतिस्थ हो न सकूँगा। कोची में भी दो दिनों का ही अवकाश था, तीसरे दिन बहुत सबेरे तिरुवनन्तपुरम के लिए प्रस्थान करना था हमें, लेकिन एक दिन पहले ही मैंने आलेख पूरा कर लिया और मेल पर प्रेषित करके दायित्व-मुक्त हुआ।...


मुझे लगता है, किसी विधा में, किसी भी विषय पर, कुछ भी लिखना हो तो उसके लिए दिमागी रसोई जब तैयार हो जाती है, तब लेखन निर्बाध गति से होता है। पारिस्थितिक व्यवधान भी आयें तो वे लेखन का मार्ग अवरुद्ध नहीं कर पाते; क्योंकि विचार, भावनाएं और इच्छित अभिव्यक्तियाँ सिद्ध होकर मस्तिष्क की कड़ाही में उबलने लगती हैं और उफनते दुग्ध की तरह पात्र से बाहर निकल आने को व्यग्र हो जाती हैं। फिर उन्हें तत्काल लिख डालना ही एक कलमकार की विवशता हो जाती है। यह विवशता मैंने बार-बार महसूस की है। शब्द-सामर्थ्य हो, भाषा-शैली पर किंचित् अधिकार हो, विचार और चिंतन को क्रमिक स्वरूप देते हुए तारतम्य गढ़ने की कला हो, तो भाषा का रथी गद्य के रणक्षेत्र में हुंकार भरता हुआ निरंकुश दौड़ सकता है।...

मैं क्या और मेरी हस्ती भी क्या! पूज्य पिताजी से मिली शब्द-संपदा और मेरा पल्लवग्राही ज्ञान जितना आलोक उनकी उपस्थिति मात्र से ग्रहण कर सका है, उसी ऊर्जा से लिख लेता हूँ थोड़ा-बहुत। लिखने की विवशता से ही लिखा है यह आलेख भी। अब इसकी छह कड़ियाँ कल से क्रमशः आपके सम्मुख होंगी। यह तो आप ही बता सकेंगे कि भाग-दौड़ के बीच लिखी गयी यह दीर्घकाय रचना आपको कैसी लगी!

वैसे, बताता चलूँ कि स्मारिका का प्रकाशन हो चुका है और दिनांक 9अक्तूबर, '17 को बिहार के उप-मुख्यमंत्री श्रीसुशीलकुमार मोदी के कर-कमलों द्वारा इसका विमोचन भी किया जा चुका है, मेरे सहपाठी अभिन्न मित्र और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री श्रीनन्दकिशोर यादव की उपस्थिति में...! स्थानाभाव, समायोजन की विवशताओं के कारण संपादकीय कतरनी भी यत्र-तत्र चली है, शीर्षक को भी सुघड़ बनाया गया है, लेकिन फेसबुक पर यह आलेख मैं अपने दिये हुए शीर्षक के साथ ही यथावत् रख रहा हूँ, वैसे मानता हूँ कि आलेख की तरह ही सिरनामा भी बड़ा हो गया है।...भई, खिचड़ी मेरी बनायी हुई है, मुझे अधिक नमक के साथ भी अच्छी लगती है...

यह प्रस्तावना (इंट्रो) भी इतनी बड़ी हो गयी कि इसे एक अलग पोस्ट की तरह रखना मुझे उचित प्रतीत हुआ। इसे पढ़कर आप अपने मन को तैयार कर रखिये, कल से किस्तें पढ़ने को...। इस प्रस्तावना पर अपनी पसंदगी का इज़हार करने की भी आवश्यकता नहीं है। पहले आलेख की पहली किस्त तो पटल पर आने दीजिए प्रभो! नमस्कार!!]

--आनन्द.

रविवार, 29 अक्तूबर 2017

समंदर की शिल्प-सृष्टि...

[दक्षिण की यात्रा से लौटकर...(6)]

पूवर के रिसाॅर्ट पर पहुँचते ही शंकाएँ निर्मूल हो गयीं। हम बहुत ऊँचाई से, सँकरे, सर्पिल और अनगढ़ मार्ग से यह सोचते उतरते गये कि जाने कहाँ जाकर ठहरेंगे हम! लेकिन विस्तृत भू-भाग पर आते ही हमारे सामने एक ऐसा अलभ्य गवाक्ष खुल गया, जो मरकत मणि-द्वीप-समान था। दो-दो प्रवेश-द्वारों को पार कर जब हम 'ईस्चुअरी आईलैण्ड' के अन्दर पहुँचे तो हमारे सम्मुख था एक संपूर्ण आनन्द-लोक! देव-भूमि के निर्जन में बसा दिव्य-लोक! स्वच्छ मार्ग, शान्त और उल्लसित वातावरण, सर्वत्र हरीतिमा, नील जल से भरा तरण-ताल, बैक वाटर पर तैरता रेस्टोरेंट, दृश्यावलोकन के लिए बनाई गयी ऊँची अटारियाँ, मोटर बोट तक ले जानेवाली लाल टाइल्स की शोभायमान पगडंडियाँ और समुद्र का परित्यक्त प्रचुर जल--हरित क्रांति मचाता हुआ!

वहाँ पग धरते ही मन प्रफुल्लित हो गया। तीन घण्टों की अनवरत कार-यात्रा की थकान छूमन्तर हो गयी। बैक वाटर की बोट-यात्रा को ऋतज मचलने लगे। रिसाॅर्ट के दो अंतःसंबंधित सुसज्जित कक्ष पहले से ही सुरक्षित थे और हमारे आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। हमने वहाँ अपना सामान डाला, मुंह-हाथ धोकर प्रसन्न-मन हुए और निकल पड़े नौकायन का आनन्द लेने। नारियल के फल से लदे वृक्षों के बीच से गुज़रते हुए हम बोट के पास पहुँचे, सवार हुए और बोट बैक वाटर में तैरती चल पड़ी उस पार! अमित आनन्द हुआ।

यह देखकर आश्चर्य हुआ, आनन्द भी कि समुद्र स्वयं अपने परिश्रम से बनाता है टीले, तालाब और तंग गलियारे और लौट जाता है अपनी सर्वभौम सत्ता के हृदप्रदेश में। जब कभी उसे लगता है कि उसके द्वारा निर्मित तालाब का जल कम हो रहा है, वह रात्रिकाल में यत्नपूर्वक तंग गलियारों से पुनः आता है, तालाब में जल भरता और चला जाता है नि:शंक। प्रकृति और पर्यावरण में हस्तक्षेप, निर्माण और विध्वंस तथा पुनर्निर्माण, पुनःसृजन उसका परिश्रम है, प्रमोद भी; क्रीड़ा है, व्यायाम भी। हम सृजन देख प्रसन्न होते हैं, मुग्ध-विस्मित और रोमांचित होते हैं तथा विध्वंस देख क्षुब्ध होते हैं, दुखी होते हैं, विकल होते है; लेकिन समंदर तो समंदर है, वह अपनी अनवरत क्रीड़ा में मग्न रहता है, हित-अनहित की चिंता से निर्लिप्त!
मनुष्य भी तो अपने जीवन में यही सब करता है न? बनाता है, मिटाता है; मिटाता है, बनाता है और एक दिन खुद मिट जाता है; क्योंकि वह भी स्वयं प्रकृति की निर्मिति ही है...!

बैक वाटर को पार कर जब हम दूसरे छोर पहुँचे तो हमने देखा, समुद्र ने अपने निरंतर श्रम से पीली रेत का लंबवत् एक टीला बना दिया है, जिसके उस पार घहराता समुद्र तरंगित है। उसकी लहरें दौड़-दौड़कर किनारे पर आती हैं और टीले को सैंकत-कणों की सौगात सौंप जाती हैं। वहाँ हमने बहुत देर तक आनन्द-भजन किया, नारियल का मीठा जल पिया, अनानास के मीठे टुकड़े खाये, जल-क्रीड़ा की, ऋतज ने अपने पितृश्री के साथ मल्लयुद्ध किया, तस्वीरें खींचीं-खिंचवायीं और सूर्यास्त के पहले ही बोट से लौट आये। समुद्र और बैक वाटर के बीच की रेतीली जमीन पर टिके रहने की समय-सीमा निर्धारित थी। हमने नियमों का पालन किया।

रिसाॅर्ट लौटकर मैंने और श्रीमतीजी ने तैरते हुए शानदार रैस्टोरेंट में दो कप चाय पी और जब देयक सामने आया तो मैं चकराया। दो कप चाय के 180 रुपये देने होंगे? पटना में दो रुपये की कुल्हाड़वाली चाय पीने का अभ्यासी मैं, विस्मित था! इतने वर्षों में वहाँ मूल्य बढ़ा भी होगा तो पाँच-दस तक पहुँचा होगा। लेकिन इतनी चिंतना का अवकाश नहीं था, देयक भुगतान की प्रतीक्षा में था। मन मारकर मैं दायित्व से मुक्त हुआ और अपने कमरे में लौट आया।

शाम सात बजे हम सभी तरण-ताल में उतरे और करीब एक घण्टे तक जल-विहार करते रहे। श्रीमतीजी के पास पूल में प्रवेश का मानक और निर्धारित वस्त्र नहीं था, लेकिन बड़ी का उत्साह देखिये, वह पन्द्रह मिनट में परिसर की एक दुकान से अपनी माँ के लिये न सिर्फ स्विमिंग ड्रेस खरीद लायी, बल्कि उस नवीन परिधान में उन्हें लेकर पूल में प्रविष्ट हुई। मैं अपनी ही भार्या को देखकर पहचानने की चेष्टा करता रहा... वह तो एक आधुनिका देवीजी-सी दीख रही थीं--नितांत अपरिचिता। वह भी ससंकोच पूल में प्रविष्ट हुईं और ऋतज के साथ मिलकर यह भूल गयीं कि वह मुझ वृद्ध की वृद्धा हैं। स्विमिंग पूल का सर्वाधिक आनन्द हमारे छोटे सरकार ऋतज ने उठाया। वह तो पूल से बाहर आना ही नहीं चाहते थे। उन्हें समझा-बुझाकर बाहर निकाला गया। स्नानोपरान्त हमारी सारी कंथा दूर हो गयी, हम सज-धजकर तैयार हुए और थोड़ी तफ़रीह करते हुए प्रकृति की उद्दाम सुन्दरता का आनन्द-लाभ करते रहे।...

जब रात के साढ़े नौ बज गये, हम रात्रि-भोजन के लिए रैस्टोरेंट में पहुँचे। रात्रिकाल में बैक वाटर भी समुद्र-सा प्रतीत हो रहा था। चंचल वायु थी और रौशनी में नहाते हुए रैस्टोरेंट के प्रकाश की प्रतिच्छाया जल की सतह पर तैर रही थी। अद्भुत आनन्द और अप्रतिम सौन्दर्य की सृष्टि थी वहाँ। हम सबों ने अपनी-अपनी पसंद के व्यंजनों का आदेश वेटर भाई को दे दिया। शानदार माहौल की मादकता और सुन्दरता को निहारते हुए हमने भोजन ग्रहण किया। हम रेस्तराँ से बाहर आये और उसके बाद तेज समुद्री हवाओं का आनन्द लेते बैक वाटर के किनारों की सैर करते रहे। वहाँ 'मैं' तो था ही, सर्वत्र आनन्द ही आनन्द पसरा हुआ था।







कई बार मोद-मग्न शरीर को थकान की अनुभूति नहीं होती। वह किये जाता है श्रम... और श्रम, रहता है उल्लसित--आनन्द के पालने में झूलता हुआ दिग्भ्रमित; किन्तु शरीर का रसायन सहेजकर रखता जाता है तद्जन्य क्लांति का गणित। जब हम अपने-अपने कक्ष में शयन के लिए शय्याशायी हुए तो गहरी नींद आयी। अब तो सुबह शीघ्र जागरण की विवशता भी नहीं थी। मैं सात बजे जागा, लेकिन श्रीमतीजी और बिटियारानी छह बजे ही जागकर वैक-वाटर के किनारों का एक चक्कर लगा आयीं। आनन्ददायी सुबह में पलकें खुलीं, तो हाथ-पाँव और कंधों में ख़ासा दर्द था। संभवतः वर्षों बाद स्विमिंग पूल में तैरने और उधम मचाने के कारण। ऋतज जब जागे, ताजगी और स्फूर्ति से भरे हुए हुए थे। वह मुझे ललकार रहे थे--'नानजी! चलिए, चलते हैं पूल में।' वह पूल में तैरने-स्नान करने का स्वप्न लेकर ही शायद सोये थे पिछली रात! मैंने उन्हें बताया कि 'पूल में तैरने की वजह से ही मेरे शरीर में दर्द हो रहा है। मैं तो बाथरूम में ही स्नान करूँगा बच्चू!' उन्होंने एक बुजुर्ग की तरह मुझे समझाया--'नानजी, आप पूल में दुबारा तैरेंगे तभी दर्द दूर होगा, नहीं तो और ज्यादा होगा। सच में।' उनकी ज़िद पर मुझे फिर पूल में उतरना पड़ा। वह बार-बार मेरे पास तैरते हुए आते और दर्द-निवारण की नयी-नयी युक्तियाँ बताते। इतना तो सच है कि पूल में तैरना-स्नान करना आनन्ददायी लगा, लेकिन पूल से बाहर आकर मैंने जाना कि शरीर के दर्द में ख़ासी कमी भी आ गयी है। ऋतज भी लगातार मुझसे पूछते ही रहे--'नानजी, अब ठीक हो गया न दर्द?' इस तरह दर्द की बात सबको ज्ञात हो गयी, जिसे मैंने पोशीदा रखा था सुबह से...।

सुबह का जलपान यहाँ भी रिसाॅर्ट की ओर से ससम्मान 'काॅम्प्लीमेंटरी' था। जब हम रेस्तराँ में पहुँचे तो वहाँ भी विविध व्यंजनों की बहुत बड़ी नुमाइश लगी हुई थी, लेकिन वो कहावत है न, दूध का जला...! मैंने मन को संयम का पाठ पढ़ाया और व्यंजनों की ओर संयत भाव से बढ़ा। लेकिन, जब एक-एक व्यंजन ब्राह्मण की रसना को तृप्ति देने लगा तो वह सारे बंधन भूल गया और उसने फिर उदर को आकण्ठ भर लिया। तृप्त होकर हम सब वहाँ से दस बजे उठे। अब हमारे पास दो घण्टे का वक़्त था, हमें बारह बजे रिसाॅर्ट से कोचीन की यात्रा पर निकलना था--260 किलोमीटर की अनवरत यात्रा पर!...

हमने सामान समेटा। अंतिम भुगतान के लिए जब हम 'रिसेप्शन' पर पहुँचे तो हमें लंबा-चौड़ा देयक थमा दिया गया और लेकिन हम इस बात से संतुष्ट और प्रसन्न थे कि सुबह के 'कम्पलीमेंट्री ब्रेकफास्ट' में हमने हिसाब बराबर कर लिया है।...

उसके बाद द्रुत गति से सड़क पर दौड़ चली रविजी की कार। बीच राह में रुक-रुककर नारियल-जल पीते हुए हम चलते ही रहे--अंतहीन रास्ता। न राह खत्म होती, न दामाद सा' की हिम्मत घटती। सम्पूर्ण मार्ग की शोभा तो वर्णनातीत है। हमारे साथ-साथ समुद्र भी दौड़ रहा था, लेकिन विपरीत दिशा में। बारह बजे के पूवर से चले हुए हम रात आठ बजे बेटी के घर पहुँचे। आठ घण्टों का अबाधित परिचालन--यह दामाद साहब के ही वश की बात थी, उन्हीं का हियाव था। यात्रा की थकान तो थी, लेकिन हमें इसकी अत्यधिक प्रसन्नता थी, संतोष था कि हम अपने कलेजे में समेट लाये थे ज़िन्दगी से भरी हुई ढेर सारी ताज़ा हवाएँ और मस्तिष्क में अविस्मरणीय, अनमोल यादें।

हँसी-खुशी का बस, एक दिन और शेष था। बेटी-दामाद-ऋतज से बहुत सारी बातें हुईं, चित्रों का आदान-प्रदान, प्रसाद का बँटवारा हुआ और उसके अगले ही दिन, मात्र डेढ़ घण्टे में वायुयान हमें ले आया कोची से बहुत दूर--पूना के भीड़-भरे शहर में और हमें छोड़ गया यहाँ तन्हा-तन्हा!...
[इति वार्ताः]

--आनन्द.
3-10-2017.

सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

दिव्य-भूमि से देव-भूमि पर...

[दक्षिण की यात्रा से लौटकर...(5)]

आकाश में अपने आगमन की पूर्व सूचना देते हुए जो रक्ताभ तिरंगा दिवाकर की रश्मियों ने फहराया था और जो अपूर्व दृश्य हमें दिखलाकर दिन-भर की अनवरत यात्रा पर चल पड़े थे, उसी से हर्षोन्मत्त हुए हम सब होटल से पाँच किलोमीटर दूर 'हिडन ट्विन बीच' चले गये। बाल-गोपाल की ज़िद थी, सुबह का वक्त था और खुशनुमा माहौल था। 'बीच' पर पहुँचने के लिए बलुआई खड़ी ढलान से नीचे उतरना था। मुझे तो नींद पूरी न होने की थकान थी, चित्त पर खिन्नता सवार थी, सिर में हल्का दर्द था और बीच पर उधम मचाने का वैसा कोई शौक भी मुझे नहीं था। दरअसल, 29 सितम्बर से हम निरन्तर यात्रा ही तो कर रहे थे और रैन बसेरों में अधकच्ची निद्रा लेकर आगे बढ़ते जा रहे थे। चार दिनों में थकान बढ़ते-बढ़ते चरम दशा में पहुँच गयी थी।... लिहाज़ा, मैं तो 'उच्चस्थानेषु पण्डिता' ही बना रहा, लेकिन युवक-युवतियाँ बच्चों सहित बीच पर जा पहुँचे। आश्चर्य की बात कि घुटनों के दर्दवाली मेरी श्रीमतीजी भी ऋतज की पुकार की अनसुनी न कर सकीं और सँभल-सँभलकर पग बढ़ाते, सहारा लेते हुए नीचे उतर ही गयीं और मैं काफी दूरी से उनकी तस्वीरें उतारता रहा।..

लेकिन, घण्टे-भर में धूप तीखी हो गयी और मेरे शरीर का रसायन तत्व बिगड़ने लगा, मस्तिष्क का नेटवर्क भाग चला; क्योंकि मैं अपना पान-तम्बाकू का थैला होटल के कमरे में ही छोड़ आया था। वह तो प्रभु भास्कर की कृपा हुई कि जल-क्रीड़ा करनेवाले दल को भी उनकी प्रखर रश्मियाँ चुभने लगीं और वे ऊपर आ गये। 'बीच' से होटल की राह निर्जन, कितु आकर्षक थी। दल के प्रायः सभी सदस्यों ने मध्य-मार्ग की एक छोटी-सी दुकान में चाय पी और होटल लौट आये।

होटल-प्रबंधन ने अपने सम्मानित अतिथियों के स्वागतार्थ निःशुल्क स्वल्पाहार (काॅम्प्लिमेण्ट्री ब्रेकफास्ट) का समय निर्धारित कर रखा था--8.30 से 10। हम नौ बजे के आसपास ही होटल पहुँच गये थे। पूरा दल शीघ्रता से स्नान-ध्यान में जुटा। 'बीच' से साथ लायी बालुका-राशि से पूर्णतः मुक्ति पाकर हम सभी होटल के बेसमेण्ट में पहुँचे, जहाँ नाश्ते का बढ़िया प्रबंध था। भोज्य-पदार्थ जब मुफ़्त का मुहय्या हो तो चित्त प्रसन्न हो जाता है और 'मेनू' देखने की आवश्यकता नहीं होती। दातव्य के अन्न पर रीझ जानेवाला विप्र तो मन्त्रमुग्ध-सा ठीक उसी तरह व्यंजन की ओर बढ़ता है, जैसे गुड़ की ढेली की ओर पंक्तिबद्ध बढ़ते हैं चींटे। युग बदला है, युग-धर्म बदला है, रोजी-रोजगार के लिए घर से निकले हैं विप्र-बंधु भी, बड़ी संख्या में; लेकिन सनातन परम्परा के गुण-तत्व रक्त-मज्जा से जाते कहाँ हैं? वे रह जाते हैं वृत्ति बनकर स्थायी भाव में...!

बेसमेण्ट के बड़े-से हाॅल में विभिन्न प्रकार के दक्षिण भारतीय व्यंजन तो थे ही, पूरी-भाजी, टोस्ट-बटर, गर्मागरम बनता ऑमलेट-दोसा, चाय-काॅफ़ी, कटे हुए फलों और जूस के काउंटर भी सजे हुए थे और हमें हसरत भरी निगाहों से तक रहे थे; जैसे हमलोगों से ही कह रहे हों--'आओ भाई, हमें खा-पी लो।' उनका यह प्रीत-पगा आमंत्रण बहुत लुभावना था। हम सभी भूखे व्याघ्र की तरह व्यंजनों पर टूट पड़े। हमने उन स्वादिष्ट पदार्थों को अल्पाहार की तरह नहीं, बल्कि संपूर्ण भोजन से भी अतिरिक्त मात्रा में ग्रहण किया। बच्चों ने आहार के साथ फल खाये, तरबूज का मीठा रस पिया, फिर मिल्कशेक भी गटक गये। हम भी अभी कहाँ बूढ़े हो गये थे अच्छी तरह? उदर में अधिकाधिक जितना कुछ डाल सकते थे, भविष्य की चिंता किये बिना, डालते गये। अधेड़ उम्र का मेरा पेट भी 'कन्फ्यूज़' हो गया कि यह सब क्या हो रहा है उसके साथ! उसे पायज़ामे के जारबंद का बंधन भी अप्रिय लगने लगा था।... अत्याचार किसी के भी साथ हो, वह नाराज़ जरूर होता है।





वहीं नाश्ते की टेबल पर बेटी-दामाद सा' ने तय किया कि हम कन्याकुमारी से कोचीन की यात्रा एकमुश्त न करके, बीच में एक रात का विश्राम लेंगे और तत्पश्चात् कोचीन के लिए प्रस्थान करेंगे। मध्य मार्ग का हमारा विश्रामालय होगा पूवर का 'बैक वाटर का रिसाॅर्ट'। दामाद साहब के दोनों मित्रों को भी सपरिवार अलग-अलग दिशाओं में जाना था। वे दोनों 10 और 10.30 पर गन्तव्य के लिए प्रस्थान कर गये। हमने डेढ़ घण्टे तक होटल में ही विश्राम कर शरीर और उग्र हुए उदर को शांत होने का अवकाश दिया। लेकिन डेढ़ घण्टे में उदर शांत-संयमित होनेवाला था नहीं, वह मुँह फुलाये रहा।...एक-दो बार वह मुँह तक आया भी, जैसे कुछ कहना चाहता हो। मैंने बलपूर्वक उसे यथास्थान बने रहने को बाध्य किया।

दिन के ठीक बारह बजे हम 70 किलोमीटर के सफ़र पर होटल से चल पड़े--पूवर के लिए। इकहरी सड़क थी, ढाई-तीन घण्टे का सफ़र था, लेकिन राह के दोनों किनारों के दृश्य चित्ताकर्षक थे। नारियल और ताड़ वृक्षों की अनन्त श्रृंखला सर्वत्र थी--शोभायमान! यह यात्रा अपेक्षाकृत शांति से सम्पन्न हो रही थी। ऋतज की आवाज़ के अलावा सिर्फ बेटी के स्वर सुनने को मिल रहे थे, वह भी तब, जब राह बताने की आवश्यकता होती; क्योंकि जीपीएस का नियंत्रण उन्हीं के अधीन था। कसे हुए पेट से सभी परेशान थे और नींद के झटके खा रहे थे। दिन के भोजन का तो प्रश्न ही नहीं था।...

अपने शरीर पर अगर किसी का पूरा नियंत्रण था, तो वह थे दामाद सा', जबकि सबसे अधिक श्रम उन्हें ही करना पड़ रहा था। तमिलनाडु की सीमा लाँघने के पहले दामाद सा' ने सड़क-किनारे कार रोकी। उतरकर कुछ कदम पीछे गये, जहाँ छोटी-सी मड़ैया में ताड़-नारियल के फलों का अंबार लिए एक वृद्ध बैठे थे। बड़े-बड़े शीशे के गिलासों में वह शर्बत जैसा पेय पदार्थ ले आये। उन्होंने बताया कि यह 'ताड़ी-मुंजु' है। इसे पीने के बाद तंद्रा भंग होगी और उदर की उथल-पुथल शांत हो जाएगी। उनके जोरदार समर्थन के कारण हम सबों ने शर्बत पिया, जिसमें श्वेत-पनीले और अतिमधुर टुकड़े मिश्रित थे। उसका पान कर जब हम आगे चले तो रविजी ने विस्तार से बताया कि वे श्वेत-पनीले टुकड़े दरअसल ताड़-वृक्ष के फल के अंदर के कोए थे।...और, आश्चर्य की बात कि उस पेय को ग्रहण करने के आधे घण्टे में ही उदर की उग्रता शांत हुई और हम बोलते-हँसते बढ़ते गये।...

बारह बजे के चले हुए हमलोग ढाई बजे पूवर के 'ईस्चुअरी आईलैण्ड' (केरल) पहुँच गये और वहाँ की निराली शोभा देखकर दंग रह गये।... वह तो पृथ्वी पर स्वर्ग के समान सुन्दर भूमि-भाग था।...हम दिव्य-भूमि से देव-भूमि पर आ गये थे।...

--आनन्द.
02-10-2017.

गुरुवार, 19 अक्तूबर 2017

अविस्मरणीय रहेगा वह सूर्योदय... आजीवन...

[दक्षिण की यात्रा से लौटकर...(4)

होटल पहुँचकर, सद्यःस्नान-समापनांतर, हम सभी रात्रि-भोजन के लिए पास के एक भोजनालय में गये। अच्छे आहार से तृप्त होकर, उनींदी आँखें, थकान से बोझ बनी देह लिये जब होटल के शानदार, गुदगुदे और मुलायम बिस्तर पर गिरे तो बेहोशी की नींद आयी। पार्श्व में घहराते समुद्र की गर्जना भी निद्रा में बाधक न बन सकी। मुझे लगा, सुदूर दक्षिण के समुद्री-तट पर समुद्र अपेक्षया शांत और संयमित है, वैसा उद्विग्न, उच्छृंखल और आक्रामक नहीं, जैसा मुंबई, कोलकाता अथवा जगन्नाथपुरी के तटबंधों पर है--हाहाकारी! तभी स्मरण में कौंधा, यहीं कहीं प्रभु श्रीराम ने समुद्र का दर्प-मर्दन किया था और उसे संतुलित होकर मार्ग देने के लिए विवश किया था। मुझे याद आयीं कवि भूषण की पंक्तियाँ--

"बिना चतुरंग संग वनरन लै के बाँधि वारिधि को लंक रघुनन्दन जराई है/ पारथ अकेले द्रोन भीषम सों लाख भट, जीत लीन्हीं नगरी विराट में बड़ाई है/ भूषन भनत भट गुसलखाने में खुमान अबरंग साहिबी हथ्याय हरि लाई है/ तौ कहाँ अचम्भो महाराज सिवराज, सदा वीरन के हिम्मतै हथ्यार होत आई है।"

हाँ, तभी तो कन्याकुमारी के समुद्री कछार पर लहरें किंचित् मंथर गति से आती हैं और पद-प्रक्षालन कर लौट जाती हैं, किंतु रात्रिकाल में थोड़ी स्वतंत्रता लेकर मुदित होती हैं और इसी मोद में उनका रोर कुछ बढ़ जाता है। भूषण की उपर्युक्त पंक्तियों के स्मरण मात्र से पौराणिक पात्र आँखों के सामने प्रकट होने लगे। माता सीता के वियोग में विकल प्रभु राम वन लाँघते हुए इसी भूमि-भाग में कभी आये होंगे। श्रीराम-भक्त हनुमानजी ने यहीं कहीं से लगायी होगी लंबी छलाँग। समुद्र के सुस्थिर हो जाने पर वानर-सेना ने उस पर बाँधा होगा सेतु...! मस्तिष्क सोचने लगा, यहाँ से कितनी दूर होगा रामेश्वरम्! पूछने पर ज्ञात हुआ, बहुत दूर--प्रायः तीन सौ किलोमीटर! इस जानकारी ने मेरे अतिचिंतन पर विराम लगाया।...

होटल के कमरे की खिड़कियों से हमने बाह्य परिदृश्यों का अवलोकन किया, तस्वीरें उतारीं; फिर तो निद्राभिभूत आँखें स्वयं ही बंद होने लगीं। हम शय्याशायी हुए। निद्रा देवी ने तत्काल हमें अपने आगोश में ले लिया। हम बेसुध सो गये।...

सुबह 5 बजे ही श्रीमतीजी ने झकझोर कर जगाया। यह शरीर पर अत्याचार-सा ही था, लेकिन तेजोराशेजगत्पते दिवाकर के दर्शन के लिये, उनकी अगवानी के लिए हमें जागना ही था। समय से तैयार होकर होटल के चार कमरों से चारों परिवार निकलकर लाॅबी में एकत्रित हुए--मैं सपत्नीक, दामाद साहब सपरिवार और उनके दो मित्र अपने-अपने परिवारों के साथ। अब हमें सूर्योदय दर्शन के लिए उपयुक्त स्थान पर पहुँचना था। होटल के स्वागत काउंटर पर जो संभ्रांत, सुदर्शन युवक खड़े थे, उन्होंने अंग्रेजी में पूछा--'आपलोग कहाँ जायेंगे?' दामाद साहब ने कहा--'सनराइज देखने।' स्वागतकर्ता ने सलाह दी कि 'सनराइज देखने के लिए सर्वोत्तम स्थान तो होटल के सातवें माले की छत ही है। आपलोग वहीं चले जायँ।' लिफ्ट से पूरा कुनबा तत्क्षण भवन की छत पर पहुँचा। तब तक घनान्धकार ही था--सर्वत्र। भूमि-भाग पर आसपास के जितने भवन-मन्दिर थे, वे रौशनी से जगमगा रहे थे--जल के बीच बना 'स्वामी विवेकानन्द राॅक मेमोरियल' और तिरुवल्लुवरजी की विशालकाय मूर्ति! वहाँ तक ले जानेवाली बोट का लंगर और जेटी तथा सम्मुख था दृष्टि-सीमा के परे तक बहता अनन्त सागर। यह अद्भुत-अकल्पनीय और मनोहारी दृश्य था। हमारी टोली मंत्रमुग्ध, ठगी-सी खड़ी थी!

छत पर और भी कई लोग थे। सूर्यदेव का कहीं पता नहीं था। सभी अपने सेल और कैमरे से प्रकाश तथा अंधकार के मिश्रण को कैद कर रहे थे। हमने भी वही किया। 5.30 पर हम छत पर पहुँच गये थे। गूगल सर्च ने हमें बताया था 6.08 पर प्रकट होंगे सूर्यदेव! हमारी अधीरता बढ़ती जा रही थी और लगता था, पल ठहर गये हैं, खिसकते नहीं। लेकिन, यह हमारा भ्रम था--हमारी बेकली का असर था...क्षण को अतीत का ग्रास बन जाना ही था और बिना हमें सचेत किये वह बनता जा रहा था अतीत का निवाला...!

छह बजते ही क्षितिज का रंग बदलने लगा। अंधकार परास्त होता स्पष्ट दिखा। हम सचेत-सावधान हो गये। अपनी-अपनी धुरी पर जड़, स्थिर! पहले उदयाचल का रंग धूसर हुआ, फिर पीला और फिर टुह लाल--रक्तिम! इसी लालिमा में, सुदूर आकाश में बादल का एक त्रिकोण रक्ताभ हो उठा। ऐसा लगा, सूर्यदेव ने आगमन के पहले विजय पताका फहरायी है। अचानक रवि-रश्मियों ने क्षितिज से झाँकना शुरू किया, सर्वत्र गहरा पीला रंग पुत गया क्षितिज के छोर पर। और, तभी दिनकर प्रकट होते दिखे। मुझे राष्ट्रकवि दिनकर याद आये और याद आयी बालकवि बैरागी की पंक्ति, जो राष्ट्रकवि के निधन पर उन्होंने लिखी थी--
'क्या कहा कि दिनकर अस्त हो गया,
दक्षिण के दूर दिशांचल में?'

ऐसा प्रतीत हुआ, मानो अथाह समुद्र में एक गहरी डुबकी मारकर जगतपति दिनकर बाहर आ गये हैं अभी-अभी।... आत्मा सिहर उठी। लगने लगा, कवि दिनकर अपनी अनन्त काव्य-रश्मियों के साथ लौट आये हैं भारत की भूमि पर।... दिशाएं आलोकित होने लगीं। क़ायनात का गोशा-गोशा रौशन हो उठा और तभी सैलानियों का प्रसन्नता से भरा एक शोर उठा--तुमुल नाद-सा। सैलानी, जो देश-विदेश से आकर वहाँ एकत्रित थे और देव दिवाकर के प्रातःदर्शन से हर्षोन्मत्त हो उठे थे। सातवीं मंजिल की छत से हम उन्हें भी देख रहे थे और सुन पा रहे थे वह जन-कोलाहल। वह सूर्योदय-दर्शन अद्भुत, अविस्मरणीय है और रहेगा आजीवन...!






लेकिन, यह क्या? मैंने लक्ष्य किया कि सूर्योदय उसी पश्चिम दिशा से हुआ, जहाँ कल सायंकाल सूर्यास्त हुआ था--यहाँ से ठीक डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर ! तो क्या दक्षिण भारत में सूर्योदय और सूर्यास्त पश्चिम दिशा में होता है? परमाश्चर्य ! पूछने पर ज्ञात हुआ कि यही एकमात्र ऐसा स्थल है, जहाँ ऐसा विभ्रम होता है; लेकिन मेरी शंका का समूल समाधान नहीं हुआ। जो प्रत्यक्ष घटित हुआ था, उसे नकारता कैसे?

इन दिनों मेरी दोनों बेटियों ने आपस में कुछ मंत्रणा कर अपने माता-पिता को सुख पहुँचाने का निश्चय किया है शायद! पिछले दिनों छोटी बेटी संज्ञा ने सदी के महानायक श्रीअमिताभ बच्चन से मिलवाकर मेरा एक सपना सच किया था और अब बड़ी बेटी कल्याणीया शैली और दामाद आयु. रवि ने यह दुर्लभ दर्शन का असीम सुख दिया। उन दोनों को मेरा आशीर्वाद कि उन्होंने यह संयोग बनाया, निमित्त बने, अन्यथा मैं अपने कागज़ों के अंबार का दीमक ही बना रह जाता...!

--आनन्द.
02-10-2017.

रविवार, 15 अक्तूबर 2017

बादलों की ओट धरकर सूर्य ने ले ली जल-समाधि...

[दक्षिण की यात्रा से लौटकर--3]

त्रिवेंद्रम से कन्याकुमारी सौ किलोमीटर दूर है। 65-67 किलोमीटर का सफ़र करके हम महाराजाधिराज मार्तण्डवर्मा के राजप्रासाद पहुँचे थे, लेकिन निर्माणाधीन होने के कारण मुख्य मार्ग अवरुद्ध था। हमें राजमार्ग छोड़कर सँकरे, उच्चावच और उबड़-खाबड़ रास्तों से गुज़रना पड़ा, जो भयप्रद भी था। इसमें ख़ासा वक्त बर्बाद हुआ। फिर, राजमहल में हम ऐसे मग्न हुए कि समय का कुछ होश नहीं रहा। अब 33-35 किलोमीटर की दूरी तय करनी थी और हमें भूख भी लग आयी थी। पद्मनाभपुरम् से निकलते ही उडपी का शाकाहारी भोजनालय देखकर हम हर्षित हुए और जमकर वहीं बैठ गए। पेट-पूजा से निवृत्त होकर हम पुनः दौड़ चले कन्याकुमारी की ओर। सूर्यास्त के पहले कन्याकुमारी पहुँचकर और होटल से तरोताज़ा होकर हमें 'सनसेट प्वाइंट' जा पहुँचना था। ग़नीमत थी, अब सड़क अपेक्षया अच्छी थी। हमें दामाद साहब के कार-चालन-कौशल का बड़ा भरोसा भी था, वह द्रुत गति से हमें गन्तव्य की ओर ले चले। लेकिन कार के पहियों को आखिरकार 33-35 किलोमीटर की दूरी को तो नपना ही था और दिन था कि ढलने को अधीर हो रहा था।

मनोरम वन-वीथियों की अनुपम शोभा को निहारते हुए हम क्षिप्रता से चले जा रहे थे। वनों, छोटी-छोटी पहाड़ियों और नद-नदियों के बीच से गुज़रते हुए हम सभी अपूर्व सुख का अनुभव कर रहे थे। सच है, लंबी यात्रा से हम बेहद थक गये थे, क्लांत थे, लेकिन हमारी ऊर्जा, हमारे उत्साह में कमी नहीं थी। हमारे साथ-साथ दायें हाथ घोर गर्जना करता समुद्र दौड़ रहा था और हमारी नस-नाड़ियों में भर रहा था अतीव उछाह। अनूठी सुख-सृष्टि का प्रदेश है केरल-तमिलनाडु! लेकिन 35 किलोमीटर की दूरी तय करते-करते सूर्यास्त का समय लबे-दम हो आया। होटल जाकर तैयार होने का अवकाश न रहा। हमने होटल से डेढ़ किलोमीटर पहले ही कोवलम् के बीच (सनसेट प्वाइंट) पर पहुँचना सुनिश्चित किया। समुद्र के तट पर जा खड़ा होना सचमुच रोमांचक अनुभव था। सनसेट प्वाइंट पर सैलानियों की अपार भीड़ थी, कारों-बसों का लंबा काफ़िला था। अपनी कार को थोड़ी दूरी पर छोड़कर और पद-यात्रा कर हम एक ऊँची शिला पर स्थापित हुए और सूर्यास्त की प्रतीक्षा करने लगे।...

और, थोड़ी ही देर में सूर्य पश्चिमी क्षितिज पर उतर आया, लेकिन जिधर वह अस्त होने चला, वहीं आकाश की किसी अज्ञात अभियांत्रिकी से निकलता गहरे काले धुएँ-सा बादल घनीभूत होता दिखा। ओह, दिवाकर तो बादलों की ओट जा छिपा। कभी किसी कोण से वह झाँकता तो आकाश का नज़ारा बदल जाता, समुद्र के जल की लहराती चूनर धानी हो जाती। आसमान में रंगों की बारिश हो रही थी ... साथ-साथ हमारे मन का रंग भी 'बैनीआहपिनाला' हो रहा था। सभी मुदित मन थे। समुद्री हवाएँ हमारी केश-राशि से खेल रही थीं और हम उनके साथ झूम रहे थे। यही खेल खेलता सूर्य अस्ताचलगामी हुआ, बादलों की ओट धरकर। लेकिन, उस सांध्यकाल में जो कुछ हमने देखा, वह कन्याकुमारी के समुद्र-तट से ही देखना संभव था। सचमुच, वह अद्भुत दृश्य था--अनदेखा, अनजाना दृश्य! हम रोमांचित-पुलकित वहाँ से आगे बढ़े होटल की ओर!






'सी-व्यू' होटल यथानाम तथागुण था, बिल्कुल समुद्र के किनारे। हम पाँचवें माले के अपने कमरे में पहुँचे और कमरे की खिड़कियों तथा बाल्कनी से बाहर का दृश्य देखकर प्रायः चौंक पड़े। अथाह जल-राशि हमारे सामने तरंगित थी। लहरें शीघ्रता से आतीं और तट छूकर लौट जातीं। भारत के मानचित्र को ध्यान में रखते हुए मुझे ऐसी प्रतीति हुई कि मैं देश की पाद-भूमि में एक भवन की पाँचवीं मंजिल पर निपट अकेला खड़ा हूँ और साश्चर्य देख रहा हूँ, क्षिप्र गति से आती हर लहर को, जो आती है और मेरे देश का पाँव पखारकर चली जाती है। मैं निर्निमेष देखता ही रह जाता हूँ लहरों की यह चरण-वंदना! और, यह क्रिया अनवरत होती है--अविराम! अनुभूति का ऐसा रोमांच मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया था। सोचता ही रह जाता हूँ, यह वारिधि कैसा विलक्षण भक्त है, जो निरंतर भारत-भूमि के पाँव पखार रहा है, क्षण-भर का विश्राम भी इसे स्वीकार नहीं !...
(क्रमशः)
1-10-2017

[चित्र-परिचय  : 1) सूर्यास्त-दर्शन को दौड़ चले हम 2) शिलासीन हुआ मैं 3) दर्शनार्थियों और वाहनों की भीड़ 4) सूर्यदेव को ओट देने आये बादल 5) अलौकिक अभियांत्रिकी से निकलता बादलों का काला धुआँ 6) मैं सपरिवार।

रविवार, 8 अक्तूबर 2017

राजा के किले से विभव विलुप्त हुआ, लेकिन वहाँ पुराना वक्त ठहरा मिला...

[दक्षिण की यात्रा से लौटकर--2.]

त्रिवेंद्रम से कन्याकुमारी के मार्ग में राजा अनिझम थिरुनल मार्तण्डवर्मा का किला था। मुख्य मार्ग से एक वक्र मोड़ लेकर हम वहाँ पहुँचे। राजा के किले के मुख्यद्वार पर पहुँचे तो लगा ही नहीं कि किसी उल्लेखनीय राजद्वार पर आ गये हैं। वह तो हमें किसी समृद्ध गाँव के मुखिया का उन्नत दोमंज़िला मकान-सा प्रतीत हुआ--चौड़े लाल पत्थरों के खपरैलवाला भवन ! हम सभी आश्चर्यचकित थे--आखिरकार यह कैसा राजप्रासाद?

लेकिन मुख्यद्वार से प्रविष्ट होने के बाद पतली-सँकरी सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते हुए हम फिर चकित हुए बिना न रह सके। पत्थर के स्तम्भों पर लकड़ी के मोटे बर्गों और शहतीरों से कई-कई खण्डों में निर्मित था वह राजप्रासाद! प्रत्येक खण्ड की अलग विशेषता थी। उसे भवन न कहकर भवन-समूह कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। उसका परिसर विशाल है, यह प्रवेश के बाद ही जाना जा सकता है। काष्ठ-कला अद्भुत नमूना है यह!

प्रथम खण्ड में महाराजाधिराज का कोर्ट-रूम था, जहाँ अपने सभासदों के साथ सर्वोच्च आसन पर विराजमान होकर राजा मार्तण्डवर्मा अधिकारियों के साथ विमर्श करके न्याय करते थे। उस कक्ष की महराबें और काष्ठ पर उत्कीर्ण नक्काशियाँ अद्भुत और प्राचीनकाल की हैं, यह देखकर ही समझा जा सकता है। काष्ठ निर्मित सँकरी सीढ़ियाँ प्रथम तल से दूसरे और दूसरे से तीसरे माले पर ले जाती हैं। निर्माण में प्रयुक्त लकड़ियाँ आज भी यथावत् हैं अपनी पूरी चमक और आन-बान-शान के साथ।




तीन शताब्दी पहले दक्षिण के एक सर्वसमर्थ, शासन की धुरी, विस्तृत भू-भाग के एकछत्र स्वामी महाराजाधिराज क्या ऐसे भवन में निवास करते थे? यह सोचकर भी आश्चर्य होता है। 300 वर्ष पूर्व महाराज मार्तण्डवर्मा ने ही अपने प्रयत्नों से पद्मनाभस्वामी मंदिर का कायाकल्प किया था। तीन सौ वर्ष--उंगलियों पर गिनी जानेवाली तीन शताब्दियां, लेकिन इन तीन शताब्दियों में न जाने कितनी पीढ़ियाँ आयी-गयीं, जाने कितना-कुछ बदल गया भारत के इस भूमि-खण्ड पर!

मैने उत्तर भारत के अनेक राजप्रासादों को देखा है, मुगल-काल के अनेक बादशाहों के किले देखे हैं, किन्तु सुदूर दक्षिण के पद्मनाभपुरम् के मार्तण्डवर्मा के महल की सादगी और सुरुचि मुझे प्रभावित करती है और मुझे विस्मित भी करती है। धर्म में गहरी आस्था रखनेवाले और युगानुरूप आसन्न संकटों-अवरोधों से जूझनेवाले राजा मार्तण्डवर्मा ने अपने जीवनकाल में अद्भुत शौर्य और पराक्रम का परिचय दिया था। मात्र 53 वर्ष की जीवन-यात्रा में उन्होंने त्रावणकोर की बिखरी हुई रियासतों को एकीकृत किया, पद्मनाभस्वामी मंदिर के वैभव का विस्तार किया, डच सैन्य शक्ति का डटकर सामना किया और अनेक समुद्री युद्धों में उन्हें परास्त कर उनकी विस्तारवादी नीतियों पर विराम लगाया। दो प्रमुख सेना-नायकों और ग्यारह हज़ार डच सैनिकों को उन्होंने युद्धबंदी बनाया तथा उदयगिरि के बंदीगृह में डाल दिया। कालान्तर में राजा मार्तण्ड वर्मा ने दया दिखाते हुए युद्धबंदियों को इस शर्त पर रिहा कर दिया कि वे फिर कभी भारत-भूमि पर दिखाई न दें और उन्हें अपने सैन्य संरक्षण में कोलंबो तक भेजा, लेकिन दोनों सेना-नायकों को बंदीगृह में ही रहने दिया। बाद में थोड़ी नर्मी दिखाते हुए उन्होंने अपनी सेना को प्रशिक्षित करने का काम उन्हें सौंपा, जिसे वे दोनों आजीवन करते रहे।...

सोचता हूँ, दक्षिण भारत के ऐसे धर्मरक्षक, वीर सपूत, पद्मनाभस्वामी के चरण-सेवक मात्र 53 वर्षों के अपने छोटे-से जीवनकाल में इतने सारे महत्व के काम कैसे कर सके और वह भी अपने इस छोटे-से राजप्रासाद से? कैसे...? खेद की बात है कि धर्म की धुरी माने जानेवाले, देश की अस्मिता और गौरव के रक्षक, अखण्ड भारत की संप्रभुता के ध्वजवाहक राजा मार्तण्ड वर्मा की प्रेरक जीवन-कथा को एन.सी.ई.आर.टी. की पुस्तकों में कहीं स्थान न मिला।

मैं तो देख आया दर्शनार्थियों की भीड़ से भरा हुआ राजन् का राजमहल, जहाँ का वैभव विलुप्त हो चुका है, लेकिन समय ठिठका-सहमा-दुबका खड़ा है महल के हर कक्ष में, गलियारों में, सँकरी सीढ़ियों के नीचे, पूजा-गृह में, माता के कमरे में, राजा की शय्या के नीचे, अतिथि-भवन 'इन्द्र विलास' में, परकोटों पर--और छोटे-छोटे गवाक्षों से झाँकते हुए...! क्या आप इसे देखना न चाहेंगे...?

--आनन्द.
01-10-2017.

चित्र-परिचय  : 1) राज-प्रासाद का प्रवेश-द्वार, 2) महाराजाधिराज मार्तण्ड वर्मा 3) राजन की न्यायशाला,
4) प्रासाद के गलियारे में सपत्नीक, जब एक बाँकी किरण गृह-लक्ष्मी की हथेलियों पर आकर ठहर गयी।

गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

प्रभु पद्मनाभस्वामी के द्वार पहुँचा...

[दक्षिण की यात्रा से लौटकर--(१)]

शेषनाग की शय्या पर गहन निद्रा में मग्न भगवान् विष्णु के आठ एकड़ में बने पाँच हजार वर्ष पुराने मन्दिर में विजयादशमी की सुबह 7.40 पर अपने दल के साथ पहुँचा। साथ थीं श्रीमतीजी, बेटी-दामाद और हम सबके प्यारे ऋतज! कोची से ही सहयात्री बने दामाद साहब के एक मित्र भी सपरिवार हमारे साथ थे। त्रिवेंद्रम के एक मित्र भी सपरिवार हमारे दल में आ मिले। दरअसल, दुर्लभ दर्शन को सरल-सहज बनाने की सारी व्यवस्था उन्होंने ही की थी। मन्दिर में हमारा प्रवेश सहज हो गया। एक विशेष पुजारीजी धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते हुए हमारी जिज्ञासाओं का निराकरण करते रहे। ऋतज मुझे पण्डितजी के अंग्रेजी वक्तव्यों का हिन्दी-अनुवाद बता-बताकर बार-बार पूछते रहे--'नान् जी, आप समझ गए न?' उन्होंने मान लिया है कि मैं हिंदीदाँ हूँ और अंग्रेजी का ज्ञान मुझे बिल्कुल नहीं है।...

अति प्राचीन इस धर्म क्षेत्र को पृथ्वी पर साक्षात् वर्तमान प्रभु श्रीविष्णु के स्थान की मान्यता प्राप्त है। प्रस्तर के 365 विशालकाय स्तम्भों के चौरस गलियारों के मध्य भव्य मन्दिर है, शेषनाग की कोमल शय्या पर निद्रा-निमग्न हैं प्रभु। उनके नाभि-कमल के पुष्प-दल पर विराजमान हैं ब्रह्मा, बायें हस्त में कमल का फूल है और दायीं हथेली के नीचे स्वयं समक्ष हैं देवाधिदेव महादेव! गोपुरम् का शिल्प और उसकी भव्यता दर्शनीय है, मोहित करती है।
विजयादशमी के कारण आज पद्मनाभम् स्वामी के मन्दिर-परिसर में बहुत भीड़ थी। दर्शनार्थियों की कतार का न ओर दिखता था, न छोर। वस्त्राचार का नियम-बंधन भी बहुत है, जिसका कठोरता से पालन किया जाता है। प्रत्येक महिला के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है और प्रत्येक पुरुष के लिए मुण्डु (दक्षिण भारत का धोती-लुंगीनुमां परिधान) और तन पर मात्र अंगवस्त्रम्। दामाद साहब के मित्र की कृपा से जन-समुद्र से बचते हुए हम बड़ी आसानी से श्रीहरि के दिव्य दर्शन कर आये। हमने मूल मन्दिर की परिक्रमा की, फिर ध्यान कक्ष में जा बैठे।
ध्यान का मेरा अभ्यास पुराना है, लेकिन वह अभ्यास परा-विलास के ज़माने का था, जिसके किस्से आपने पहले ही पढ़े हैं और जिसे छोड़े हुए भी एक युग बीत गया है। उस युग के ध्यान के अनुभव किसी को न बताने की खास हिदायत थी। अमूमन उन अनुभवों को मैं किसी के साथ साझा करता भी नहीं था। लेकिन अब न कोई वर्जना है, न कोई अंकुश।...

आज पद्मनाभ मन्दिर के ध्यान प्रकोष्ठ में बैठा तो सिहरन-भरी विचित्र अनुभूति हुई। मन करता है कि यह अनुभव-अद्वितीय आप सबों के साथ बाँट लूँ। 15-20 मिनट ही एकाग्रचित्त होकर बैठा था कि मानस-पटल के मध्य हरे रंग की कोमल कली प्रकट होती प्रतीत हुई। किसी चलचित्र की तरह उस कली का विकास हुआ और धीरे-धीरे उसके खुलते दल रंग बदलने लगे। पाँच मिनट के निमिष काल में वह सुन्दर गुलाबी कमल पुष्प में परिणत हो गया। उसके आसपास अलौकिक आभा बिखरी हुई थी।... और हठात् ध्यान भंग हुआ। ध्यान की अवस्था में मिले इस अलौकिक अमूर्त दर्शन का अर्थ-अभिप्राय समझने के लिए फिर मैं ध्यान-मग्न होने की चेष्टा ही करता रह गया, ध्यान लगा नहीं।

मन्दिर से निकलकर हम होटल आये। कपड़े बदले। सुबह से उपवास था। हमने अल्पाहार लिया और बच्चों की ज़िद पर चिड़ियाघर-अजायबघर गये। फिर केले के हरे पात पर सद्याभोजन ग्रहण करने एक होटल में गये। यह केरल का विशिष्ट आयुर्वेदिक आहार है--जितना चाहिए, उतना मिलेगा। हमने छककर उदरपूर्ति की। उसके बाद बीस-एक किलोमीटर की यात्रा करके पहुँचे कोवलम् के समुद्र-तट पर। अरब सागर का अन्तरराष्ट्रीय व्यपार-मार्ग हमने पुलकित भाव से देखा। 'बीच' पर बच्चों ने जल-क्रीड़ा की, फिर हम लौट चले। रात नौ बजे के आसपास हम अपने रैनबसेरे में पहुँच गये।

ऐसी अलौकिक, उल्लासमयी विजयादशमी जीवन में कभी व्यतीत नहीं हुई थी..!
--आनन्द. /30-09-2017

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

'अन्वेषी आँखें'...'आत्मा की आँखें'...


[ राष्ट्रकवि दिनकरजी की 109वीं जयन्ती (23 सितम्बर) पर पुण्य-स्मरण.]

राष्ट्रकवि पूज्य दिनकरजी के कक्ष में, उनकी कृपा-छाया में, उनके दिशा-निर्देश में, उनके श्रीचरणों में बैठकर डेढ़ महीने तक सेवा-भावना से उन्हीं का काम करना अपूर्व सुखदायक था। वे डेढ़ महीने जीवन के अविस्मरणीय दिन थे। मैंने बहुत कुछ सीखा था उनसे, बहुत-से प्रसंग सुने और अनेक कविताएँ सुनी थीं उनके श्रीमुख से। उन्हीं दिनों का एक वाकया याद आता है।

अपने काॅलेज से छूटकर उस दिन (1-5-1972 ) भी मैं यथासमय दिनकरजी के घर पहुँच गया था, लेकिन किसी कारणवश मुझे बारह बजे तक लौट जाना था। यह बात मैंने उन्हें बतायी तो बोले--'हाँ-हाँ, जरूर जाओ। डेढ़-दो घण्टे में जितना हो सके, उतना ही काम करो।' फिर मैं काम में जुट गया। 'दिनकर की डायरी' की पाण्डुलिपि के जितने पृष्ठ लिखने संभव थे, मैंने बारह बजे तक लिखे। बारह बजते ही मैं जाने को उठ खड़ा हुआ। उस वक्त दिनकरजी स्नानघर में जाने के लिए अपने वस्त्र उठा रहे थे।

मैंने उनसे कहा--'चाचाजी! बारह बज गये, अब मैं जाता हूँ।'
उन्होंने स्वीकृति दी और मैंने लौट चलने को कदम बढ़ाये ही थे कि जाने उन्हें क्या सूझी, उन्होंने कहा--'ठहरो!'
मेरे बढ़ते कदम ठिठक गये। मैं पलटा और उनकी ओर मुखातिब हुआ। मैंने देखा, वह अपने हाथ में उठाया हुआ वस्त्र कुर्सी के हत्थे पर रखकर अलमारी में सजी किताबों के पास गये और एक पुस्तक निकाल लाये। वह उनकी काव्य-पुस्तिका 'आत्मा की आँखें' थी। अपनी कलम से उसकी जिल्द के बादवाले पृष्ठ पर उन्होंने कुछ लिखा और मुझे देते हुए बोले--'लो, इसे पढ़ना। यह 'मुक्त' के लिए नहीं, तुम्हारे लिए है।'


मैं उपकृत हुआ। पुस्तक को मैंने सिर से लगाया, अपने कंधे से लटकते बुद्धिजीवी झोले में रखा और वापस लौट चला। दिनकरजी के घर से लंबी पद-यात्रा करके मुख्य सड़क पर आना होता था, जहाँ से कोई वाहन मिलता था और वह मुझे मेरे घर पटनासिटी तक पहुँचा देता था। दिनकरजी के राजेन्द्र नगरवाले घर से निकलकर मैं क्षिप्रता से चलने लगा। अभी दो-तीन फर्लांग ही गया होऊँगा कि मन में यह जानने का लोभ उत्पन्न हुआ कि देखूँ, दिनकरजी ने पुस्तक पर आखिर लिखा क्या है? इस विचार के मन में उपजते ही मेरी गति शिथिल हुई। मैंने झोले से पुस्तक निकाली, जिल्द पलटकर दिनकरजी की लिखित पंक्ति पढ़ने लगा। उन्होंने लिखा था--

"चि. आनन्द वर्ध
के योग्य,
--दिनकर
1-5-1972."

'वर्धन' का अंतिम अक्षर 'न' लिखने से रह गया था। मुझे घर पहुँचने की जल्दबाजी थी, फिर भी मैं उलटे पाँव लौटा। दिनकरजी के घर पहुँचा तो पाया, वह स्नानागार में हैं। मैं उनके कक्ष में बैठकर प्रतीक्षा करने लगा। थोड़ी ही देर में वह बाहर आये और मुझे देखते ही बोल पड़े--'अरे, तुम लौट क्यों आये?'
मैंने संकुचित भाव से कहा--"एक 'न' छूट गया है, इसलिए!" वह अभिप्राय कुछ समझ न सके। उन्होंने फिर पूछा--'क्या कहा?'
अब और कुछ कहना मेरे लिए कठिन था। मैंने पुस्तक की जिल्द खोलकर उनके सामने कर दी, बोला कुछ नहीं। उन्होंने पृष्ठ पर दृष्टिपात न करके मुझसे कहा--'हाँ, यह पुस्तक मैंने दी है तुम्हें!'..

अपनी बात स्पष्टतः उनके सामने रखना बहुत कठिन प्रतीत हो रहा था मुझे ! अंततः पृष्ठ की ओर इंगित करते हए मैंने कहा--'आपने जो लिखा है, उसे पढ़िये।' वह अपने लिखे को पढ़ने लगे और हठात् ठहाका मारकर हँस पड़े। जब संयत हुए तो बोले--"एक अदद 'न' का ही तो सवाल था! इसे तो तुम कल भी लिखवा सकते थे मुझसे। दूर तक जाकर लौट आने की क्या आवश्यकता थी?"

उन्होंने कलम उठायी और यथास्थान 'न' लिखा दिया और पुस्तक मेरी ओर बढ़ाते हुए बोले--'अब इस उम्र में मुझसे ऐसी गफ़लत होने लगी है। पहले ऐसा न था।'

मैं चलने लगा तो दिनकरजी ने खड़े होकर मेरी पीठ थपथपाई और कहा--"लगता है, अशुद्धियों-कमियों को परास्त करने का यह विरल गुण तुमने मुक्तजी से ही ग्रहण किया है। उनके सुपुत्र की ऐसी ही 'अन्वेषी आँखें' होनी चाहिए।"...

तीन लघ्वाकार पंक्तियों में एकमात्र शब्द की छूट की औचक पकड़ में मैंने कोई भगीरथ प्रयत्न नहीं किया था। अतिउत्सुकता में राह चलते पुस्तक की जिल्द पलटी और तीनों पंक्तियाँ पढ़ डालीं। दूसरी पंक्ति में अपने नाम पर पहुँचते ही आँखें ठिठक गयी थीं। मैं उल्टे पाँव लौटा था। इसमें मेरी पात्रता अथवा महार्घता का प्रश्न ही कहाँ था, लेकिन विपथ हुए एक अदद 'न' को राह पर ले आने की ऐसी तत्परता की इतनी मुखर प्रशंसा, इस रूप में, राष्ट्रकवि दिनकरजी से ही मिल सकती थी। यह उनका अमोघ आशीर्वाद ही था, जिसे ग्रहण कर और विनयपूर्वक उन्हेंं प्रणाम कर मैंं प्रसन्नचित्त घर लौटा।...
--आनन्दवर्धन ओझा.

[चित्र : देश-पूज्य दिनकरजी और उनकी अमूल्य भेंट 'आत्मा की आँखें' की वह दुर्लभ प्रति, जो आज भी मेरे संग्रह की शोभा बढ़ा रही है।]

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

और, पिताजी चिल्लाये--'मिल गया, मिल गया!'...

उन दिनों पिताजी (पुण्यश्लोक पं. प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त') 'सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू' के नौवें या ग्यारहवें खण्ड का अनुवाद कर रहे थे। वे दिल्ली-प्रवास के दिन थे।... जवाहरलालजी की अंग्रेजी के क्या कहने! वह अंग्रेजों से अच्छी अंग्रेजी बोलते-लिखते थे--यह तो जगजाहिर है। एक पूरा अनुच्छेद अल्प विराम, अर्द्धविराम, कोलनों, डैशों-हाइफनों के सहारे रचा गया--मात्र एक वाक्य! हिन्दी-अनुवाद में उन सारगर्भित विशाल वाक्यों को तोड़कर छोटे-छोटे वाक्यों में रखना सचमुच श्रमसाध्य और दिमाग का दही बना देनेवाला कष्टकर कार्य था। उस पर तुर्रा यह कि 'नेहरू शांति प्रतिष्ठान' के मंत्री श्रीकर्ण सिंह ने पिताजी से कभी कहा था--"पण्डितजी, 'नेहरू वाड्.मय' तो अथाह समुद्र है। आप अनुवाद करते चलिये, आपकी अनुवाद-भाषा नेहरूजी की हिन्दुस्तानी के बहुत करीब है।" लिहाजा अनुवाद हिन्दी में नहीं, हिन्दुस्तानी भाषा में करना था।...

जब मैंने यह प्रकरण पिताजी से सुना तो पूछा उनसे--'हिन्दुस्तानी भाषा का क्या मतलब?' उन्होंने उदाहरण देते हुए मुझे समझाया था--"अब देश का भविष्य सुरक्षित है।' अगर यही वाक्य नेहरूजी को कहना होता तो वह कहते--'अब वतन का मुस्तक़बिल महफ़ूज़ है।" बात मेरी समझ में थोड़ी-बहुत पहले भी थी, अब स्पष्ट हो गयी। पिताजी अनुवाद बोलकर भी लिखवाते थे और उनका लिपिक तो मैं था ही। जब मैं दफ़्तर चला जाता तो यह दायित्व मेरी श्रीमतीजी निभातीं। जब कोई उनकी सहायता को उपलब्ध न होता तो पिताजी स्वयं लिखते।
अनुवाद के इसी काम में पिताजी दत्तचित्त होकर लगे हुए थे। पुस्तक अधिया गयी थी। पिताजी इसे शीघ्र समाप्त करना चाहते थे। पुस्तक के प्रकाशक 'सस्ता साहित्य मण्डल' का ऐसा अनुरोध भी था। चौबीस घण्टों में सोलह घण्टे वह इसी काम में जुटे रहते थे, तभी नेहरूजी का एक वाक्य व्यवधान बनकर सामने आया--"The National Herald has published my version by putting dots on i's and cutting t's."
यह अंग्रेजी भाषा में प्रयुक्त होनेवाला एक मुहावरा (फ्रेज़) था, जो हिन्दी की प्रकृति से भिन्न था। यहीं, इसी वाक्य पर अनुवाद की गाड़ी ठहर गयी। पिताजी दो दिनों तक सोचते रहे कि "putting dots on i's and cutting t's." का अनुवाद क्या हो। उन्होंने कई तरह से वाक्य-रचना को तोड़-मरोड़कर और सजा-सँवारकर देख लिया था, लेकिन उन्हें संतोष नहीं हो रहा था। अंततः उन्होंने अपने उन मित्रों से परामर्श लेना उचित समझा जो हिन्दी के अलावा अंग्रेजी के भी निष्णात विद्वान् थे।

समय लेकर पिताजी सबसे पहले डाॅ. नगेन्द्र से मिले, फिर बच्चनजी से, तत्पश्चात् अज्ञेयजी से। सबों ने एक स्वर में कहा कि "इसमें ऐसी क्या मुश्किल है, इस वाक्य का अर्थ तो स्पष्ट ही है कि 'नेशनल हेराॅल्ड ने मेरे कथन में नमक-मिर्च लगाकर, रद्दोबदल करके प्रकाशित कर दिया।" पिताजी ने तीनों मित्रों से कहा भी--'भई, इतना तो मैं भी समझता हूँ, लेकिन इससे मुझे संतोष नहीं होता। चाहता हूँ, नेहरूजी ने वाक्य-रचना में जिन शब्दों और मुहावरे के चयन से जैसा प्रभाव उत्पन्न किया है, कुछ वैसा ही चमत्कार हिन्दी-अनुवाद में भी प्रकट हो।'...
पिताजी अपने विद्वान् मित्रों से मिलकर निराश लौट आये, जिज्ञासा का निवारण न हुआ और अनुवाद रुका रहा। पिताजी का निर्बाध एकांत चिंतन चलता रहा। दो दिन बीत गये। एक रात मैंने पिताजी से इतना-भर कहने की हिम्मत जुटायी--'बाबूजी, सबों ने ठीक ही तो कहा है, आप वही लिखकर आगे क्यों नहीं बढ़ चलते, जो अज्ञेयजी, बच्चनजी या डाॅ. नगेन्द्र ने कही है?'
पिताजी ने मुझे समझाया--'हाँ, वैसा ही लिखकर बढ़ चलूँ तो मेरा गिरेबाँ आखिर कौन पकड़ेगा? किसे फुर्सत है? और, वैसा ही लिख देने में आपत्तिजनक भी तो कुछ नहीं; फिर भी मुझे संतुष्टि नहीं होगी। जानता हूँ, अंग्रेजी और हिन्दी की प्रकृति भिन्न है, इसके बाद भी मानता हूँ कि अनुवाद में नेहरूजी के कथन की प्रभाव-छाया तो होनी ही चाहिए।'...

मैं निरुत्तर था। दूसरे दिन, बहुत तड़के, पिताजी अर्किमेडीज़ की तरह चिल्लाये--'मिल गया, मिल गया!' हम सभी उनके कमरे की ओर यह जानने के लिए भागे कि उन्हें आखिर मिल क्या गया है। उनके पास पहुँचने पर ज्ञात हुआ कि उन्हें उस व्यवधानी वाक्य का अनुवाद मिल गया था और वह कितने प्रसन्न थे, यह उनकी मुख-मुद्रा पर स्पष्ट अंकित था। उन्होंने हमें बताया कि नेहरूजी के वाक्य से भी अधिक प्रभावी और वज़नदार वाक्य उन्होंने हिन्दी में ढूँढ़ निकाला है और वह है--"नेशनल हेराॅल्ड ने मेरे कथन में बिंदु-विसर्ग लगाकर प्रकाशित कर दिया है।"

पिताजी का कहना था कि अगर 'आई' पर अनुस्वार न लगाया जाए तो उसे 'ई' पढ़ा जा सकता है और अगर 'टी' को काटा न जाये तो वह 'एल' हो जाएगा, लिहाज़ा आई और टी में अनुस्वार और कट मार्क लगा ही रहता है, उसे अलग से लगाना नहीं पड़ता, लेकिन हिन्दी में बिंदु और विसर्ग अलग से लगाने होते हैं।

अब पिताजी संतुष्ट थे। अनुवाद की रुकी हुई गाड़ी आगे चल पड़ी। अनुवाद-कार्य इतना आसान भी नहीं होता, वह घोर परिश्रम, कठिन साधना, एकाग्रता, अनुशासन, मनोयोग और वज्रासन की माँग करता है; लेकिन, एक वाक्य के लिए पिताजी की अतिचिंता, अति-चिंतन और व्यग्र दौड़-भाग मुझे चकित करती है। जब कभी यह प्रसंग याद आता है, उनका प्रफुल्लित मुख-मण्डल मेरी आँखों में तैरने लगता है और उन्हीं से बार-बार सुना हुआ यह संस्कृत श्लोक कानों में गूँजने लगता है--
'एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः शासन्वितः।
सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके कामधुग्भवति।'

मैंने अपने जीवन में तीन ऐसे मनस्वी साधकों के दर्शन किये हैं--एक पिताजी, दूसरे हंसकुमार तिवारी और तीसरे श्री श्रीरंजन सूरिदेवजी--ये तीनों शब्द-साधक जब वज्रासन में होते तो जीवन-जगत् से निर्लिप्त हो जाते और घण्टों अक्षरों से मल्लयुद्ध करते रहते--एकाग्रचित्त होकर!
निःसंदेह, पिताजी भी शब्द में विराजनेवाली ब्रह्म-सत्ता के एकनिष्ठ उपासक थे।...

[चित्र : अपने घर के स्टूडियो में अज्ञेयजी का लिया हुआ उसी कालखण्ड का चित्र ; 1977-78 का.]

बुधवार, 28 जून 2017

मालूम था, सप्ताह में दो-तीन दिन माली आता है बेटी शैली के घर और देखभाल करता है बागीचे की, लेकिन मैंने कभी देखा नहीं था उसे। बीस दिनों के प्रवास में वह आया न हो, ऐसा तो नहीं है, मगर वह जब भी आया, मैं घर के अंदर, गुसलखाने में, शेव करता हुआ, अखबार पढ़ता या टीवी देखता रहा। आमना-सामना कभी हुआ नहीं था उससे मेरा। आज सुबह मैं बिलकुल उसके सामने जा पड़ा। तब मैं बारामदे में बैठा पान बना रहा था। वह आया और मुझसे छह फीट की दूरी पर खड़ा हो गया। मुझे लगा, उसे कुछ कहना है मुझसे। मैंने आँख उठाकर देखा उसे, तो पाया कि वह मुझे ही एकटक देख रहा है। मेरी आँखें उससे जैसे ही मिलीं, वह मीठा मुस्कुराया। मैंने सोचा, मुस्कुरा लेने के बाद वह कुछ कहेगा, लेकिन वह चुप था और लगातार मुझे घूरने की हद तक देखता हुआ मुस्कुराता जा रहा था। यह मुझे कुछ अजीब-सा लगा। यह बात भी मन में उठी कि मानसिक रूप से वह स्वस्थ भी है या...

मुझे उम्मीद थी, वह नमस्ते कहेगा, 'गुड मार्निंग' बोलेगा, लेकिन वह तो मुस्कुराता हुआ 'मौनी बाबा' निकला। मन में आया कि कहूँ उससे, 'भले आदमी, जब कुछ कहना ही नहीं है तो जाओ, अपना काम करो।' लेकिन वह स्थायी भाव में था, अडिग था। अब क्या करूँ, कुछ समझ नहीं पाया। माली भाई तब ही सामने से हटे, जब मुझसे मेरी एक अदद विवश मुस्कान उन्होंने वसूल ली।...

आज ही लगे हाथ दूसरा-तीसरा हादसा भी हो गया। परसों की वापसी की यात्रा है मेरी। मैं, श्रीमतीजी और बेटी के साथ 'लुल्लू माॅल' चला गया। बचपन में महामूर्खतापूर्ण एक खेल खेला करता था--'लुल्लूपाला'। सिलाई के धागों में ढेला बाँधकर पेंच लड़ाना और प्रतिपक्षी के धागे को काटकर उसे परास्त कर सुख पाना। लगता है, उसी 'लुल्लू' नाम पर एशिया का बेस्ट माॅल उठ खड़ा हुआ है। क्या नहीं मिलता वहाँ! मैंने सोचा, कुछ मेवे-मसाले खरीद ले चलूँ, यहाँ बड़े अच्छे मिलते हैं। दोनों देवियाँ जानती हैं कि माॅल में बहुत हलकान होना मुझे प्रिय नहीं है और पान न मिलने से मेरे अस्तित्व का नेटवर्क भी 'वीक' हो जाता है, सो वांछित सामग्री खरीद लेने के बाद उन्होंने मुझे टरका दिया, कहा--'जाइये, कार में सामान सेट कीजिए और वहीं बैठकर पान खाइये, हम अभी आते हैं।'

मैंने उनकी बात मान ली, क्योंकि मेरा नेटवर्क भी कमजोर पड़ रहा था। पार्किंग में खड़ी कार में सामान रखकर मैं बैठ गया और पान बनाने लगा। तभी एक सम्भ्रांत व्यक्ति सामने से आते दिखे। पास आकर उन्होंने एक मीठी मुस्कान मेरी ओर फेंकी और जब तक जवाबी कार्रवाई में मैं अपनी चवनियाँ मुस्कुराहट उन्हें लौटा पाता, वह आगे बढ़ गये।

अभी पाँच मिनट ही बीते होंगे कि माॅल के गणवेश में चालीस के आसपास की एक महिला ट्राॅली समेटती दिखी। जिस ट्राॅली से मैंने सामान खाली किया था, उसे लेने वह कार के समीप आयी और पास पहुँचते ही उसने भी एक मीठी मुस्कान दी। एक बार तो भ्रम हुआ कि मुझमें कहीं कोई गड़बड़ी तो नहीं? लोग मुझे देख-देखकर मुस्कुरा क्यों रहे हैं आखिर? फिर मैंने तय पाया कि नहीं, गड़बड़ तो कहीं कुछ नहीं; अच्छा-खासा आधी बाहोंवाला श्वेत-स्वच्छ कुरता, वैसा ही धवल पायजामा, आँखों पर ऐनक और पाँवों में सैंडल--सब यथास्थान है, गड़बड़ क्या होगी भला? लेकिन इस दफ़ा मैंने देर नहीं की, लगे हाथ मैंने भी एक फीकी-सी मुस्कान लौटनियाँ उसे दे दी। विलंब करने में यह खतरा भी था कि कहीं वह भी मालीजी की तरह वहीं अँटक गयी और मुझे देखकर मुस्कुराती खड़ी रही, तो मेरा क्या होगा! लेकिन चिंतनीय कुछ नहीं हुआ और मेरी असहज मुस्कान लेकर वह चली गई। उसके चले जाने के बाद मन में खयाल आया कि काश, वह एक सम्भ्रांत विदुषी होती तो मैं भी, पान से पिटी और सड़ी हुई अपनी बत्तीसी बचाता हुआ, एक 'एक्सट्रा लार्ज' साइड की मुस्कान उसे दे ही देता।

मुझे फ़िक्र हुई, अपरिचित लोगों के इस तरह मुस्कान लुटाने के पीछे आखिर माजरा क्या है, यह मुझे बेटी से पूछना ही चाहिए। उसे यहाँ रहते हुए एक साल हो गया है, कुछ तो समझा ही होगा उसने, इस रहस्यमयी मुस्कान का राज़!

बेटी ड्राइव कर रही थी, मैं उसकी बगलवाली सीट पर था और उसकी माता पीछे। माॅल से लौटते हुए मैंने पूरी बात बेटी को बतायी। उसने कहा कि 'यह यहाँ का स्वाभाविक अभिवादन है। वैसे भी, मलियाली लोग वेशभूषा से भिन्न भाषा-भाषियों को चिह्नित कर लेते हैं, इसीसे वे एक स्माइल देकर ऐसे लोगों का स्वागत करते हैं।' बेटी की इस बात से मैं चकित हुआ।

दौड़ती कार मेें जब मैैं यही प्रसंग सुना रहा था और बात ट्राॅली समेटनेवाली महिला तक पहुँची थी, तभी श्रीमतीजी ने मेरी अतिभाषिणी जिह्वा थाम ली और कहा--'वह संभ्रांत विदुषी भी होती तो उससे आपको क्या फ़र्क पड़ता था?' पत्नी नामक प्रजाति में यही बड़ी ख़ामी होती है। वे मूलतः दोष-दर्शन और छिद्रान्वेषण की अधिकारिणी होती हैं। अगर मेरे मन में ऐसी कामना जगी भी थी, तो इसमें कोई दोष कहाँ था? बस, कामना-भर ही तो थी। मैैंने दबी जबान मेें कहा--'लेकिन, इसमें आपत्तिजनक क्या हैै?'

श्रीमतीजी ने जो कुुुछ कहा, वह रेेेखांकित करनेे योग्य हैै--'आपत्तिजनक तो कुुुुछ भी नहीं, बस आप यह नहीं समझ पा रहे कि यह आपका यूूूपी-बिहार नहीं, केेेेरल हैै, जहाँ शत-प्रतिशत साक्षरता है। सामान्य लोग भी अंंग्रेजी केे शब्द, वाक्य समझ लेेेेते हैैं, महिलाएँ स्कूटी चलाती हैं और पुरुष पिछली सीट पर बैठे होते हैं। यहाँ स्त्री-पुरुष का भेद ही मिट गया है। यदि पुरुष आपकी ओर देखकर मुस्कुरा सकता है और इसी रूप में आपका स्वागत-अभिनन्दन कर सकता है तो स्त्रियाँ भी ऐसा कर सकती हैं। आप अपना बिहारी चश्मा उतार कर देखेंगे, तभी यह फर्क भी समझ सकेंगे।'

श्रीमतीजी की बातों से मेरे ज्ञान-चक्षु हठात् खुल गये। मैंने अपनी स्मृति को कुरेदा तो मुझे याद आया कि तीन दिन पहले ही जब मैं अथिरापल्ली प्रपात से लौटते हुए पहाड़ की चढ़ाई चढ़ रहा था, तो सामने से आती हुई हर उम्र की कई महिलाओं और पुरुषों ने मुझे अपनी मधुर मुस्कान से नवाजा था और मैं संकुचित हो उठा था। और, मार्ग में, हम सबों ने एकसाथ ही तो देखा था, एक ग्रामीण युवती को, जो अपने छोटे-से बालक और संभवतः पतिदेव को स्कूटर पर पीछे बिठाकर आराम से चली जा रही थी।...
बेटी और श्रीमतीजी की बातों से अब समझ में आया, वह मुस्कान अकारण तो नहीं ही थी, असहज भी नहीं थी। मैं ही अपने अनुभवों और संस्कारों के शिकंजे में था और उससे मुक्त नहीं हो पा रहा था।

मैं तो खैर पकी उम्र का व्यक्ति हूँ, श्रीमतीजी की अहैतुकी कृपा से सँभल भी गया हूँ; लेकिन अपने समस्त मित्रों को सावधान करना अपना दायित्व समझता हूँ कि यहाँ आपको कोई देखकर मुस्कुराये तो आप भी भद्रतापूर्वक मुस्कुराकर उसके अभिवादन-अभिनन्दन का प्रत्युत्तर दें। भारत की इस पावन भूमि में यथासंभव नजरें झुका के चलें, कहीं ऐसा न हो कि किसी से आपकी आँख लड़ जाए और आपको कोई मुगालता हो या मुस्कुराने की विवशता से आप किसी द्विविधा में पड़े हिचकोले खाने लगें... ठीक मेरी तरह।...
(14-06-2017)

रविवार, 25 जून 2017

श्रीविष्णु प्रभाकर, जो चलते चले गये...(5)

(समापन किस्त)

सुधीजन जानते हैं, 'आवरा मसीहा' पुस्तक प्रभाकरजी के जीवन के चौदह वर्षों के अथक परिश्रम का प्रतिफल थी। मैं चाहता तो उसकी एक प्रति कहीं से भी खरीद सकता था, लेकिन उस प्रति पर प्रभाकरजी के हस्ताक्षर कहाँ से मिलते मुझे! उसकी एक प्रति मुझे उन्हीं के कर-कमलों से चाहिये थी, उनके आशीर्वाद के साथ। मैंने उसकी लंबी प्रतीक्षा भी की थी। अब वह अमूल्य प्रति मुझे हस्तगत हुई थी। मैं उपकृत हुआ उनके घर से पटना लौटा था।

लेकिन, यह मेरा दुर्भाग्य ही था कि कई वर्षों तक खूब जतन से रखी हुई वह प्रति मेरे चचेरे अनुज पढ़ने के लिए मुझसे माँगकर ले गये। तीन महीनों तक वह पुस्तक उन्होंने लौटायी नहीं तो मैंने उसकी माँग की। उन्होंने बहुत दुःखी होकर मुझे बताया कि 'भइया, मैं भी उसे पढ़ न सका। आपके यहाँ से लेकर जाते हुए ही वह साइकिल के कैरियर से राह में कहीं गिर गयी और मुझे पता भी न चला।' उनसे यह वृत्तांत सुनकर मैं बहुत आहत हुआ, ऐसा लगा जैसे कोई बहुमूल्य निधि मेरे हाथ से फिसल गयी है।... इतने महत्व की पुस्तक इतनी असावधानी से वह क्यों ले चले, यह समझना मेरे लिए कठिन था।... लोग पुस्तक-प्रेमियों की पीड़ा नहीं समझते शायद।

प्रभाकरजी से प्राप्त दूसरी पुस्तक 'अर्द्धनारीश्वर' की प्रति मेरे पास आज भी सुरक्षित है, उसके प्रथम पृष्ठ पर उन्होंने जो कुछ लिखा है, वह द्रष्टव्य है--
"प्रिय बंधु आनन्दवर्धन ओझा को
बहुत-बहुत स्नेह के साथ,
पुराने दिनों की याद में--
--विष्णु प्रभाकर
25-1-1997."
प्रभाकरजी के इस छोटे-से उद्गार में मुझे उनकी सहज प्रीति की सुगंध मिलती है और मेरा मन उनकी प्रणति को मचल उठता है!...

लेकिन उसके बाद लंबे  समय तक मेरा दिल्ली जाना हो न सका। पिताजी के दिवंगत होने के बाद परिस्थितियाँ विषम हो गयी थीं। पत्नी पटना से बहुत दूर चक्रधरपुर में थीं, आगे की पढ़ाई के लिए बेटियाँ दिल्ली चली गयी थीं और सबसे बड़ी बात, छोटी बहन रुग्ण होकर शय्याशायी थी। मैं पटना में कीलबद्ध होकर रह गया था, युद्ध-भूमि में अभिमन्यु-सा अकेला! सन् 1999 में छोटी बहन भी साथ छोड़ गयी।...

फिर लंबा अरसा गुजर गया। प्रभाकरजी से पत्राचार पर अचानक विराम लग गया। उनके अस्वस्थ होने की खबरें समाचार पत्रों से मिलीं भी, तो मैं अवश-निरुपाय था।...श्रीमतीजी के स्थानांतरण की चेष्टाओं, बिखरी हुई गृहस्थी के जाल-जंजाल को समेटने, बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी द्वारा प्रदत्त दायित्वों को निभाने और एक लघु पत्रिका के संपादन में मैं ऐसा मशगूल हुआ कि बाहरी दुनिया से असम्पृक्त-सा हो गया। प्रभु ने प्रभाकरजी को दीर्घायु प्रदान की थी। दीर्घ आयुष्य किसी के भी कष्ट का कारण होता है और प्रभाकरजी भी अपने हिस्से आयी वार्धक्य की कष्ट-पीड़ाएँ भोगते रहे... और जीवन के 97 वसंत देखकर जाने कब चलते-चलते दुनिया की गलियाँ छोड़ (11-4-2009) गये...! सच मानिये, इस कड़वे सच से मैं कई दिनों तक अनजान ही रहा और जब मुझे पता चला तो आत्मा में एक हाहाकारी तूफान उठा था...! आह! अब वह मोहिनी सूरत मुझे कभी देखने को नहीं मिलेगी, जिसमें दिखते थे मुझे बाबूजी!... वे मृदु स्वर भी अब सुनने को न मिलेंगे, जिनमें बाबूजी के स्वरों की अनुगूँज थी।...

मुझे लगता है, अपनी जीवन-यात्रा में प्रभाकरजी निरंतर चलते ही रहे, कहीं रुके नहीं, कभी थके नहीं। 'ज्योतिपुंज हिमालय' की तराइयों से उत्तुंग शिखरों तक चलते चले गये, चौदह वर्षों तक 'आवारा मसीहा' के धुँधले पदचिह्न ढूँढ़ते रहे, वह 'गंगा-यमुना के नैहर में' गये, 'हँसते निर्झर, दहकती भट्ठी' को पद-दलित कर आये और इसी तरह अनिकेतन अथक यात्री बने रहे। और, अब तो वह अनन्त पथ के यात्री हो गये हैं...!


प्रभाकरजी की एकमात्र कविता-पुस्तक है--'चलता चला जाऊँगा'। नि:संदेह वह अपना सर्वस्व इस जगत् को सौंपकर चले गये...यहाँ तक कि अपनी कंचन-सी पार्थिव काया भी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के हवाले कर गये...! उनकी मधुर-मनोहर स्मृतियों को मेरा साश्रु नमन है!...
(समाप्त)

[चित्र : पुस्तक 'चलता चला जाऊँगा' का आवरण और 'अर्द्धनारीश्वर' के प्रथम पृष्ठ पर अंकित प्रभाकर जी के अक्षर, 25 जनवरी,1997.]

शनिवार, 24 जून 2017

श्रीविष्णु प्रभाकर, जो चलते चले गये...(4)

पिताजी के प्रयाण के बाद भी प्रभाकरजी के पत्र आते रहे, लेकिन पत्राचार की गति शिथिल होती गयी। सन् 1997 के जनवरी महीने में कुछ ऐसी विवशता आ पड़ी कि मुझे दिल्ली जाना पड़ा। 'विवशता' इसलिए कह रहा हूँ कि घर पर बीमार छोटी बहन को छोड़कर जाना पड़ा था, श्रीमतीजी भी अपनी नौकरी के कारण पटना से बाहर थीं, छोटे भाई और बड़ी बेटी के भरोसे घर छोड़ आया था। दिल्ली पहुँचकर मैं काम की भीड़-भाड़ और भाग-दौड़ में लग गया था, फिर भी मन की यह ज़िद थी कि प्रभाकरजी के दर्शन अवश्य करने हैं।
मैं वक्त निकालकर सुबह-सुबह उनके घर, अजमेरी गेट के पास, कुण्डेवालान पहुँचा। प्रभाकरजी बैठके में अपनी शय्या पर अधलेटे मिले। क्लांत दिखे, थोड़े कृश भी। प्रणाम करके मैं उनके पास ही सोफ़े पर बैठ गया और बातें करने लगा। मुझे देखकर उनके मुख-मण्डल पर दो क्षण के लिए प्रसन्नता की चमक दिखी और फिर फीकी पड़ गयी। मैंने पूछा--'क्यों, तबीयत ठीक नहीं है क्या?'
उन्होंने बुझी हुई आवाज़ में कहा--'जैसा प्रभु ने रख छोड़ा है, वैसा ही हूँ। शरीर की शक्ति बहुत घट गयी है। अब तो ठीक से लिखना-पढ़ना भी नहीं हो पाता।'

सिद्ध लेखक कुछ लिख न सके, अध्यवसायी कुछ पढ़ न सके तो वह पीड़ित होता है; क्योंकि वही तो उसकी जीवनव्यापी साधना होती है और मनोरंजन भी। यह मैं अपने अपने अनुभव से जानता हूँ। तब पिताजी को गुजरे एक साल दो-ढाई महीने ही हुए थे, वह भी अपने अंतिम दिनों में कहने लगे थे--'अब लिखना-पढ़ना कुछ हो नहीं पाता तो जीने की इच्छा नहीं होती।'... लिहाजा, जीना है तो कार्यक्षम रहते हुए जीना है और उसकी अनिवार्य शर्त लिखना-पढ़ना है।

प्रभाकरजी के मुख से ठीक यही बात सुनकर मुझे उनमें पिताजी दिखे। मैंने उनसे कहा--'बाबूजी भी यही कहने लगे थे, जब उनके लिए लिखना-पढ़ना कठिन होने लगा था।'
प्रभाकरजी ने आर्त्त स्वरों में कहा था--'मैं भी उन्हीं की राह पर हूँ आनन्द!'
फिर तो हमारी बातें पिताजी की स्मृतियों में खो गयीं। प्रभाकरजी पिताजी को याद करते हुए उनके संस्मरण सुनाने लगे कि 'जब वह मेरे घर दो दिनों के लिए ठहरे थे तो ऊपरी माले पर अपने कमरे में जाते हुए भयभीत हो जाते थे; क्योंकि उन्हें आँगन के बीचो-बीच लगी लोहे की जाली को पार करना पड़ता था, जिससे नीचे का भू-भाग दिखायी पड़ता था।'

पिताजी से सम्बद्ध कई प्रसंग सुनाते हुए प्रभाकरजी की कंथा दूर हो गयी थी, वह मुखर हो उठे थे और बीच-बीच में हँस पड़ते थे। उन्हें प्रसन्न और प्रकृतिस्थ हुआ देखकर मुझे खुशी हुई थी।...

हमारी यह मुलाकात लंबी खिंच गई। इस बीच मैंने अंदर से आयी चाय पी ली थी और कुछ भोज्य पदार्थ भी ग्रहण कर लिया था। अब मुझे लौटकर कुछ काम निबटाने थे और पटना के लिए रात की गाड़ी पकड़नी थी। चलने के ठीक पहले मैंने प्रभाकरजी से कहा--"आवारा मसीहा' कई साल पहले ही मार्त्तण्ड बाबूजी की लाइबरी से लेकर मैंने पढ़ी थी, लेकिन मैं चाहता हूँ कि उसकी एक हस्ताक्षरित प्रति मैं अपने पास सुरक्षित रखूँ। बहुत पहले आपने उसकी एक प्रति मुझे देने का आश्वासन भी दिया था।"

प्रभाकरजी 'ठहरो' कहते हुए बमुश्किल उठ खड़े हुए और धीरे-धीरे चलते हुए घर के अंदर दाखिल हुए। पाँच मिनट बाद ही वह वापस आये। उनके हाथ में एक नहीं, दो पुस्तकें थीं। वह शय्या पर बैठे, कलम उठायी और पुस्तक की जिल्दें पलटकर उस पर कुछ लिखने लगे। मैं कुतुहल-जड़ित शिशु-सा उन्हें देखता रहा। लिख लेने के बाद दोनों प्रतियाँ मुझे देते हुए बोले--"आवारा मसीहा' ही नहीं, तुम 'अर्द्धनारीश्वर' नाम का यह उपन्यास भी ले जाओ, पढ़ना इसे, अकादमी से पुरस्कृत ग्रंथ है यह !"

मैंने पुस्तकों को सिर नवाया, प्रभाकरजी के चरण छुए और चलने को उठा खड़ा हुआ तो उन्होंने कहा--"फिर जब कभी दिल्ली आना तो जरूर मिलना।' मैंने स्वीकृति दी, करबद्ध हो पुनः प्रणाम किया और चल पड़ा।...
(क्रमशः)

[चित्र : 'आवारा मसीहा' की प्रति और उस काल-समय का मैं.]

शुक्रवार, 23 जून 2017

श्रीविष्णु प्रभाकर, जो चलते चले गये...(3)


साहित्य की हर विधा में प्रभाकरजी ने प्रचुर लेखन-कार्य किया। उन्होंने नाटक लिखे, उपन्यास लिखे, कहानियाँ और कविताएँ लिखीं, तो जीवनी और भ्रमण-वृत्तांत भी लिखा। वह सर्वप्रिय साहित्यकार थे, हर दीर्घा, हर प्रकोष्ठ, हर गोलबंदी में उनकी पैठ थी और सर्वत्र उन्हें समादर प्राप्त था। अलंकरण-उपाधियों-सम्मानों की उन पर वर्षा हुई थी, लेकिन वह अनासक्त भाव से सब ग्रहण कर आगे बढ़ चले। राष्ट्रपति-भवन में हुए दुर्व्यवहार से क्षुब्ध होकर उन्होंने 'पद्मभूषण' जैसी उपाधि लौटा दी थी और साहित्य जगत् में तहलका मच गया था। उनमें अभिमान लेश मात्र नहीं, किन्तु स्वाभिमान पर्याप्त मात्रा में था।

एक बार उन्हीं के पत्र से पता चला कि कोलकता के किसी आयोजन में सम्मिलित होकर वह अमुक ट्रेन से पटना होते हुए दिल्ली लौटेंगे, लेकिन पटना रुकेंगे नहीं। पटना के लिए एक दिन भी न निकाल पाने पर उन्होंने क्षोभ व्यक्त किया था। पत्र पिताजी को संबोधित था। मैंने पिताजी से कहा--'मैं स्टेशन जाकर ट्रेन में प्रभाकरजी से मिलना चाहूँगा।' पिताजी ने सचेत करते हुए कहा था--'ट्रेन तो थोड़ी देर ही रुकेगी और तुम्हें यह भी मालूम नहीं कि प्रभाकरजी किस कोच में सफ़र कर रहे होंगे। जब तक तुम उन्हें ढूँढ़ोगे, ट्रेन चल पड़ेगी।'

लेकिन, नियत तिथि को मैं सपत्नीक स्टेशन गया था और श्रीमतीजी के कहने पर प्रभाकरजी के लिए थोड़े फल और मिष्टान्न साथ लेता गया था। जैसा पिताजी ने कहा था, उस भीड़-भड़क्के में प्रभाकरजी को ढूँढ़ निकालने में थोड़ा वक्त तो जरूर लगा, लेकिन वातानुकूलित डब्बों की संख्या तीन-चार ही थी, हमने उन्हें खोज निकाला। अचानक मुझे सम्मुख उपस्थित देख प्रभाकरजी खिल उठे। वह सपत्नीक यात्रा कर रहे थे। हमने उन दोनों के चरण छुए। श्रीमतीजी चाचीजी के पास बैठकर बातें करने लगीं। प्रभाकरजी ने मुझसे कहा--'इतनी जहमत उठाने की क्या आवश्यकता थी? बस, दो घड़ी की मुलाकात के लिए तुम घर से इतनी दूर क्यों चले आये?' मैंने मुस्कुराते हुए कहा--'बहुत दिन हो गये थे, आपसे मिले हुए...और आप पटना से होकर गुजर रहे थे, मैंने सोचा, इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए।...और, मैं चला आया।'... मेरा उत्तर सुन प्रभाकरजी मुग्ध हुए और एक मीठी मुस्कान उनके अधरों पर खेल गयी।

हम दोनों की शक्लों पर मिल पाने का संतोष और स्वाभाविक प्रसन्नता मूर्त्त थी। श्रीमतीजी बातों में मशगूल, यह भूली बैठी थीं कि फल-मिठाई का पैकेट उन्हें देना भी है। मेरा ध्यान भी उस ओर नहीं गया। अचानक ट्रेन ने चलने के पहले सावधान करनेवाली सीटी बजायी। हम शीघ्रता से उतरने को तत्पर हुए और पुनः चरण स्पर्श को झुके, तब श्रीमतीजी को खाली हाथों की जरूरत पड़ी और उन्हें हाथ के पैकेटों का खयाल आया। उसे चाचीजी के सुपुर्द करते हुए उन्होंने कहा--'यह आपके लिए है!' तदनन्तर हड़बड़ी में प्रणाम कर वह आगे बढ़ीं और उनके पीछे मैं भी। पीठ पीछे से आती चाचीजी की आवाज हमें सुनाई पड़ी--'अरे साधना, तुम नाहक यह सब ले आयीं। कलकत्ता वालों ने इतना सारा खाने-पीने का सामान...!' और उनकी आवाज मद्धम होती हुई शोर-शराबे में विलीन हो गयी।...

स्नेहमयी चाचीजी से वही अंतिम मुलाकात थी हमारी। कालांतर में प्रभाकरजी की पुस्तक 'शुचि स्मिता' में उनकी मर्मस्पर्शी गाथा ही हमारे बीच रह गयी, जिसे पढ़कर मेरी आँखें सजल हो उठी थीं। वह ममतामयी माता भी संसार-सागर से विमुक्त हो गयी थीं।...

सन् 88 में अलीगढ़ में डाॅ. पाहवा से एक आँख की शल्य-चिकित्सा के उपरांत आँख पर हरी पट्टी बाँधे पिताजी दिल्ली गये थे और एक-दो दिनों के लिए प्रभाकरजी के अतिथि बने थे। सन् '95 में पिताजी के निधन के बाद प्रभाकरजी ने एक संस्मरणात्मक आलेख उन पर लिखा था, जो नवभारत टाइम्स की समस्त इकाइयों के संपूरक अंक में छपा था। वह अंक पटना में मुझे भी हस्तगत हुआ था, जिसे पढ़कर मैं भावुक हो गया था।...

पिताजी को लिखे उनके कई पत्रों की कतिपय पंक्तियाँ मर्मवेधी हैं। दरअसल, अपने उत्तर जीवन में उन्हें हृदयहीन व्यवसायियों से लोहा लेना पड़ा था जो उन्हीं के कुण्डेवालान स्थित घर के बाहरी परिक्षेत्र के पुश्तैनी किरायेदार थे। उनसे नाममात्र का किराया मिलता था और वे बहुत बड़े भू-भाग पर काबिज़ थे। कई निवेदनों-मनुहारों के बाद भी उसे खाली करने को वे तैयार नहीं थे। एक सहृदय साहित्यिक, एक संवेदनशील रचनाकार, एक भावुक कवि और एक कल्पनालोक में विचरण करनेवाले मसिजीवी के लिए यह जागतिक रस्साकशी प्राणांतक पीड़ा देने वाली थी। अपनी यह पीड़ा कई मुलाकातों में उन्होंने पिताजी के सम्मुख व्यक्त की थी और उनके पत्रों में भी इस पीड़ा के स्वर-संकेत उभर आते थे।...

पिताजी के निधन के बाद मेरे एक पत्र का उत्तर देते हुए उन्होंने 1 फरवरी 96 को लिखा था--"...काम तो मैं भी करता हूँ, पर अब थक गया हूँ। और कुछ समस्याएँ ऐसी, जिनका हल कब होगा, पता नहीं। भ्रष्टाचार के दावानल में इंसानियत तो समाप्त ही हो गयी। गुण्डा और पैसा दो ही साधन हैं। दोनों ही हमारी सीमा से बाहर हैं। अब जो होना होगा, हो जाएगा।
बस, एक ही बात है, मैं भी अब किनारे पर हूँ, पता नहीं कौन-सा क्षण अंतिम हो। बस यही चाहता हूँ, उस अंतिम क्षण तक जागृत रहूँ।..."

प्रभाकरजी के इस पत्र को पढ़कर मेरा मन व्यथित हुआ था। वह नितान्त सहृदय-निष्कलुष व्यक्ति थे, मैं नहीं जानता, प्रभु ने यह पीड़ा उन्हें क्यों दी थी। मैं यह भी नहीं जानता कि उनके जीवनकाल में उन्हें इस पीड़ा से मुक्ति मिली भी या नहीं।...
(क्रमशः)

[चित्र  : प्रभाकरजी का 1 फरवरी 1996 का वह मार्मिक  पोस्टकार्ड.]

गुरुवार, 22 जून 2017

श्रीविष्णु प्रभाकर, जो चलते चले गये...(2)

बहरहाल, वे सपनों-से दो दिन बीत गए, लेकिन मुझे प्रभाकरजी की सहज प्रीति और अविरल स्नेह की डोर से हमेशा के लिए बाँध गए। सन् '76 के उत्तरार्द्ध में अचानक स्थानांतरित होकर मैं पुनः दिल्ली पहुँच गया और '79 के अंत तक दिल्ली में ही रहा। इन तीन वर्षों में ऐसे अनेक अवसर मिले, जब प्रभाकरजी के दर्शन हुए, मिलना हुआ और सभा-समितियों में उनकी वाग्मिता से परिचित होने का मौका भी मिला। गाँधीवादी युग का पूरा प्रभाव उनके विचारों, उनके व्यक्तित्व और परिधान में दृष्टिगोचर होता था। खादी का मोटा कुरता-पायज़ामा, जिस पर शोभायमान खादी की बंडी, सिर पर दुपल्ली गाँधी टोपी, कंधे से लटकता खादी का झोला, आँखों पर ऐनक और गले से लिपटा मफ़लर--यही उनका परिधान आजीवन रहा। वह बहुत संतुलित, मधुर और सारगर्भित वचन बोलते थे।

मुझे याद है उस सभा की, जो दरियागंज (दिल्ली) से आनेवाली सड़क के चौराहे पर हुई थी--आसिफ़ अली गेट पर। उस सभा मेें प्रभाकरजी के साथ जैनेन्द्रजी भी पधारे थे। तब मैैैं राजकमल प्रकाशन के संपादकीय विभाग से संबद्ध था। भोजनावकाश में भागकर उस सभा में मैं सम्मिलित हो गया था। जब पहुँचा तो प्रभाकरजी बोल रहे थे। मैं ध्यान से सुनने लगा। एक दुरूह विषय पर वह बोल रहेे थे और इतनी सहजता से विषय का प्रवर्तन कर रहे थे कि मैैैं उसके सम्मोहन में बँधा रहा--मंत्रमुग्ध-सा! उनके बाद जैनेेेन्द्रजी माइक पर आये। वह तो ख्यात वाग्मी थे ही। उनकी वाग्मिता भी ऐसी थी कि मैं वहीं ठगा-सा खड़ा रह गया और मुझे दफ्तर लौटने की सुध न रही। शाम चार बजेे सभा समाप्त हुई तो मैैं भागा-भागा दफ़्तर पहुँचा और मुझे प्रबंध निदेशिका श्रीमती शीला संधुजी का कोपभाजन बनना पड़ा।...

मेरे स्मृति-कोश में ऐसे अनेक अवसरों की यादें सुरक्षित हैं, जिनमें प्रभाकरजी प्रमुखता से उपस्थित हैं; चाहे वे साहित्यिक गतिविधियों के कार्यक्रम रहे हों या पारिवारिक आयोजनों के; क्योंकि पिताजी के साथ मैं भी अनिवार्य रूप से हमेशा उनके साथ होता था। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदीजी के अवसान पर गाँधी शांति प्रतिष्ठान के प्रांगण में जुटे साहित्यिकों में प्रभाकरजी भी उपस्थित थे और सन् '79 में जब मार्त्तण्ड उपाध्यायजी का निधन हुआ था, तब भी अपने अग्रज मित्र को विदा करने के लिए प्रभाकरजी घर से श्मशान-भूमि तक हमारे साथ चले थे। उनकी मार्त्तण्डजी से पुरानी और पारिवारिक घनिष्ठता थी। सबके मुख-मण्डल पर अपने-अपने अंतर्संबंधों से उपजी शोक की छाया थी तब...!

जब दिल्ली छूटी और मैं हरद्वार में तीन वर्ष व्यतीत कर पटना लौटा, तब भी प्रभाकरजी से पत्राचार होता रहा। उनके ज्यादातर खत तो पिताजी के पास आते, लेकिन उन पत्रों में भी वह मेरी खोज-खबर लेते रहते थे। बड़े स्नेही थे प्रभाकरजी! मुझे ठीक याद नहीं कि वह किस सन् की बात है, लेकिन जब उन्हें बिहार सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा सम्मान दिया गया था और वह उसे ग्रहण करने पटना आये थे, तब सम्मान प्राप्त करने के पहले मेरे घर पधारे थे। उन्होंने पिताजी को विनम्रतापूर्वक प्रणाम करते हुए कहा था--'मैंने सोचा, सम्मान ग्रहण करने से पहले आपका आशीर्वाद ले लूँ।' पिताजी और प्रभाकरजी की उस मुलाकात का दृश्य अपूर्व था। पिताजी कहते ही रह गये कि 'भाई, हम तो हमउम्र हैं' और प्रभाकरजी ने झुककर बाकायदा उनसे आशीर्वाद की याचना की थी। पिताजी प्रफुल्लित और हर्ष-गद्गद थे और प्रभाकरजी उपकृत! प्रभाकरजी सदल-बल पधारे थे--जिसमें उनकी अगवानी कर रहे सरकार के प्रतिनिधि तो थे ही, पत्रकारों की एक टोली भी थी। कई लोग तो घर के बाहर ही रुक गये थे। वह अधिक समय तक रुके नहीं, लेकिन जितनी देर ठहरे, हमारे छोटे-से घर में गहमा-गहमी बनी रही।...
(क्रमशः)

बुधवार, 21 जून 2017

श्रीविष्णु प्रभाकर, जो चलते चले गये...

[मित्रों, प्रख्यात साहित्यकार स्व. विष्णु प्रभाकरजी की आज जयन्ती है। सौभाग्य से मैं उनका स्नेहभाजन रहा हूँ। उन पर कुछ लिखने की इच्छा बहुत दिनों से मन में थी। जानता था, लिखने की बातें मेरे पास हैं, लेकिन यह स्मृति-लेख पूरा लिख न सका था। आज उस अकर्मण्यता से मुक्त होकर यह लंबा संस्मरण आप सबों के सामने रख रहा हूँ और इसी रूप में उनकी पावन स्मृतियों को स्मरण-नमन कर रहा हूँ।
--आनन्दवर्धन.]

श्रीविष्णु प्रभाकर, जो चलते चले गये...

सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रद्धेय विष्णु प्रभाकरजी के दर्शन का सौभाग्य पहली बार मुझे कब मिला था, यह स्पष्टतः स्मृति में अंकित नहीं है, फिर भी ऐसा लगता है कि सन् 1971 में जब मैं पहली बार दिल्ली-दर्शन के लिए पिताजी के साथ वहाँ गया था और पिताजी अपने एक पुराने मित्र (जो दो वर्ष बाद ही उनके समधी भी बने) मार्तण्ड उपाध्यायजी से मिलने उनके दफ़्तर 'सस्ता साहित्य मण्डल, कनाॅट प्लेस जाने लगे तो मैं भी उनके साथ गया था; सम्भवतः विष्णु प्रभाकरजी के प्रथम दर्शन मुझे वहीं मिले थे। उनके एक-दो नितांत औपचारिक प्रश्नों के उत्तर देने के अतिरिक्त मेरी और कोई बात उनसे नहीं हुई थी। तब उन्हें देखना, उनकी बातें सुनना और मेरा प्रणाम निवेेेेदित करना ही हुआ था। मार्त्तण्ड उपाध्यायजी, यशपाल जैनजी, विष्णु प्रभाकरजी और सम्मान्य वियोगी हरिजी के दत्तक सुपुत्र भगवद्दत्त 'शिशु'जी की प्रियवार्ता होती रही और मैं मूक श्रोता ही बना रहा।...

संयोग कुछ ऐसा बना कि सन् '74 में पिताजी को लोकनायक जयप्रकाशजी के आग्रह पर पटना छोड़ दिल्ली जाना पड़ा। कुछ महीने बाद, स्नातक की परीक्षा से निवृत्त होकर, मैं भी उन्हीं के पास पहुँच गया। दिल्ली की कई साहित्यिक सभाओं में विष्णु प्रभाकरजी के दर्शन और उनके व्याख्यान सुनने का अवसर प्राप्त होता रहा, लेकिन वह दूर का दर्शन ही था। कभी-कदाचित् उन्हें प्रणाम निवेदित करने का अवसर भी मिल जाता था, लेकिन उनकी आँखों में मुझे अपने लिए अपरिचय का भाव ही अधिक दिखता। सन् '75 के अगस्त महीने में मैं अपनी पहली नौकरी पर कानपुर चला गया और उनकी निकटता पाने से वंचित रह गया।...

21 जून 1912 को मुजफ्फरनगर (उ.प्र.) के मीरापुर ग्राम में जन्मे विष्णु प्रभाकरजी से पिताजी की पुरानी मित्रता थी--आकाशवाणी सेवा-काल की, 1955-56 की, जब वह बतौर नाट्य-निर्देशक दिल्ली में सेवारत थे। वह पिताजी से दो-ढाई वर्ष छोटे थे और पिताजी को वयोज्येष्ठता का पूरा सम्मान देते थे। उनका आरम्भिक जीवन संघर्षपूर्ण था। उन्होंने बहुत परिश्रम और स्वप्रयत्न से अध्ययन किया था, उपाधियाँ अर्जित की थीं, भाषाएँ सीखी थीं और अंततः सन् '57 में सेवा-मुक्त होकर स्वतंत्र लेखन को ही अपनी आजीविका के रूप में चुना था। यह जोखिम-भरा निर्णय था, लेकिन वह अपने निश्चय पर अडिग रहे और आजीवन लेखकीय दायित्वों का निर्वहन करते रहे। उन्होंने उत्कृष्ट गद्य-लेखन किया। वह गाँधीवादी युग के अप्रतिम रचनाकार थे। उनकी कृतियों में देश-प्रेम, राष्ट्रवाद और सामाजिक उत्थान की प्रबल भावना मुखरित हुई है।

कानपुर की नौकरी के दौरान ही मुझे विष्णु प्रभाकरजी के निकट आने तथा उनका स्नेहभाजन बनने का सुयोग प्राप्त हुआ था। स्वदेशी की सेवा के दौरान ही वहाँ मुझे मिले थे प्रभाकरजी के सुपुत्र--अमित भैया! लेकिन इसकी जानकारी मुझे बहुत बाद में हुई थी। वह मेरे खेल-मित्र थे और स्वदेशी के वरिष्ठ अधिकारी। हमारे बैचलर क्वार्टर के पीछे बने ऑफिसर्स क्वार्टर में सपत्नीक रहते थे। सुदर्शन युवा थे। उनसे सिर्फ क्लब में मिलना होता। मैं उनके साथ टेबल टेनिस खेलता। हमारी जोड़ी खूब जमती थी।

उन दिनों ही मैं अपने एक कृत्य के लिए बहुत प्रसिद्धि पा रहा था। वह कृत्य पराविलास था, जिसके लिए पिताजी की वर्जना मुझे मिलती रहती थी। एक दिन खेलकर हम दोनों पसीने-पसीने हुए कुर्सियों पर बैठ गए थे। थोड़े विश्राम के बाद घर जाते-जाते अमित भइया ने कहा--'मैं चार-पांच दिन क्लब नहीं आ सकूँगा। दिल्ली से मेरे माता-पिताजी आनेवाले हैं।' मैंने औपचारिकतावश उनसे पिताजी का नाम पूछ लिया। अमित भइया बोले--'वह जाने-माने साहित्यकार हैं। तुम तो हिंदी में रुचि रखते हो, तुमने उनका नाम अवश्य सुना होगा। उनका नाम है--श्रीविष्णु प्रभाकर।'
उनसे यह जानकार मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई थी कि वह स्वनामधन्य विष्णु प्रभाकरजी के सुपुत्र हैं। मैंने हुलसकर कहा--'वह तो मेरे पिताजी निकट मित्र हैं। १९७१ में उनसे मेरी एक मुलाकात भी हुई है--सस्ता साहित्य मण्डल कार्यालय में--कनॉट प्लेस में। संभव है, उन्हें इसका स्मरण न हो, लेकिन आप मेरे पिताजी का नाम लेंगे तो वह निश्चय ही पहचान लेंगे।'
अमित भाई ने मेरे पिताजी का नाम पूछा। मैंने पिताजी का पूरा नाम बताकर उनसे कहा--"आप उनसे सिर्फ 'मुक्तजी' कहेंगे तो भी वह पहचान लेंगे।"

इसके बाद दो दिन बीत गए। अमित भइया के क्लब में दर्शन न हुए। मैं समझ गया कि वह अपने माता-पिताजी के साथ व्यस्त होंगे। मेरे मन में यह इच्छा अवश्य थी कि एक बार फिर विष्णु प्रभाकरजी के दर्शन होते। दूसरे दिन शाम के वक़्त अमित भाई ने अपने सेवक को मेरे पास भेजा और सूचित किया कि पिताजी चाहते हैं, कल सुबह की चाय मैं उनके साथ पियूँ। मैं प्रफुल्लित हो उठा और सेवक से मैंने कल आने की स्वीकृति भेज दी।

सुबह तैयार होकर मैं पहली बार अमित भइया के घर पहुँचा। उस दिन विष्णु प्रभाकरजी से मिलकर परमानन्द हुआ। वह सौम्य-मूर्ति, संयत-सम्भाषी और अति स्नेही व्यक्ति थे। वह पिताजी का बड़े भाई की तरह बड़ा आदर-सम्मान करते थे। उस पीढ़ी के लोगों में आचार-व्यवहार की यह मानक परम्परा थी और लोग इसका पालन बहुत सावधानी से किया करते थे। यह पिताजी की घनिष्ठ मित्रता का ही प्रभाव था कि उस दिन वह बहुत प्रेम से मिले, पिताजी और मेरे काम-धंधे के बारे में पूछते रहे। इसी बीच अमित भाई बोल पड़े--'आनंद तो यहाँ बड़े साहस का काम कर रहे हैं। आत्माओं को बुलाते हैं और उनसे बातें करते हैं।'
विष्णु प्रभाकरजी ने ठीक पिताजी की तरह ही मुझसे कहा था--"मनुष्य को प्रकाश की तरफ बढ़ाना चाहिए, अंधकार की ओर नहीं। परालोक एक अँधेरी सुरंग की तरह है और एक अँधेरी दुनिया में भटकने का कोई लाभ नहीं है। संभव है, इससे किसी का हित हो जाए, किसी को मनःशांति मिले, लेकिन किसी की हानि भी तो हो सकती है। इस दुविधापूर्ण दिशा में बढ़ने का क्या लाभ?'

मैं संकोच से गड़ा जा रहा था, शांत था; लेकिन चाहता था कि किसी तरह बात की दिशा बदल जाए। तभी बड़ा अच्छा हुआ कि श्रीमती प्रभाकर (पूजनीया चाचीजी) अपनी बहूजी के साथ चाय-नाश्ता लेकर आयीं। मैंने उनके चरण छुए और उनका आशीष पाकर धन्य हुआ। अब बात की दिशा स्वतः बदल गई थी। चाचीजी बहुत मृदुभाषिणी महिला थीं। उन्होंने आग्रहपूर्वक मुझे बहुत कुछ खिलाया और चाय पिलाई। जब चलने को हुआ तो बोलीं--'तुम मेस का भोजन करते हो न, कैसा खाना बनता है वहाँ?' मैंने कहा--'ठीक-ठाक, उदर-पूर्ति हो जाती है।'
मेरे उत्तर से उन्होंने जाने क्या अभिप्राय ग्रहण किया कि तत्काल मुझसे कहा--'तो ठीक है, आज रात का खाना तुम हमारे साथ ही कर रहे हो--घर का भोजन ! तुम्हें खाने में क्या पसंद है, मैं वही बनाऊँगी, बोलो !' उनकी सहज और अनन्य प्रीति से मैं अभिभूत हो उठा था। मैंने कहा--'आप जो भी बनाएंगी, मैं प्रसन्नता से खाऊँगा।'

उनकी ममतामयी मूर्ति देखकर और उनकी बातें सुनकर मुझे अपनी माँ की याद आ रही थी।
अमित भइया के यहाँ रात के भोजन के वक़्त भी अमित आनंद हुआ। उन दिनों प्रभाकरजी की पुस्तक 'आवारा मसीहा' बहुत चर्चा में थी। वहाँ से परम तृप्त और आप्यायित हुआ जब लौटने लगा तो मैंने उनसे अपने लिए 'आवारा मसीहा' की एक प्रति मांगी तो बोले--'यहां तो प्रतियाँ हैं नहीं, तुम जब दिल्ली आओगे, तो उसकी प्रति तुम्हें अवश्य दूँगा। '

दो दिनों में श्रद्धेय विष्णु प्रभाकरजी के दो बार दर्शन पाकर और उनके सान्निध्य से मन बहुत प्रसन्न हुआ था, लेकिन उनकी वर्जना के शब्द कानों में निरंतर गूँज रहे थे--'मनुष्य को अन्धकार की ओर नहीं, प्रकाश की दिशा में बढ़ना चाहिए और…परालोक एक अँधेरी सुरंग की तरह है...!'
(क्रमशः)