शनिवार, 18 नवंबर 2017

पाटलिपुत्र के सहित्याकाश में जब चमकी थी 'बिजली'...सजी थी 'आरती'...

बहुत तो नहीं, फिर भी एक लंबा अरसा गुज़रा पटना शहर (पटनासिटी) की गलियाँ छोड़े--जहाँ की गलियाँ वाराणसी की याद दिलाती हैं। प्रायः 40-42 साल पहले आठ वर्षों के लिए सिटी-प्रवासी बना था। उन आठ वर्षों के वक्त का हर लम्हा मेरे कलेजे में धड़कता है आज भी। ज़ेहन में करवटें बदलता है वह गुजरा हुआ ज़माना। स्मृतियों एक हुजूम है, जो चलचित्र की तरह चलता ही जाता है मन के निभृत एकांत में...! सोचता हूँ, ऐसा क्या ख़ास था वक्त के उस टुकड़े में, तो ख़याल आता है कि उस कालखण्ड ने न सिर्फ मेरा, बल्कि एक समूची पीढ़ी का कायाकल्प किया था, दिये थे संस्कार, बनाया था साहित्यानुरागी। मेरे साथ अतिरिक्त लाभ यह था कि मुझे जन्मना मिले थे साहित्य-प्रेम के स्फुलिंग। मैं श्रमजीवी, एकनिष्ठ, एकांत साधक-साहित्यकार और विद्वान् पिता (स्व. पं. प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त') का ज्येष्ठ पुत्र था। निःसंदेह, यह मेरा सौभाग्य था।...

गुरु गोविन्द सिंह की जन्म-स्थली होने का गौरव इसी पुण्यभूमि को प्राप्त है। गायघाट और तख़्त श्रीहरमन्दिर साहब के विशालकाय गुरुद्वारे अपनी नींव में उस गौरवशाली अतीत की अनेक गाथाएँ समेटे आज भी शान से खड़े हैं। पश्चिम में गायघाट का प्रसिद्ध गुरुद्वारा है तो पूरब में गुरु गोविन्द सिंहजी की बालक्रीड़ा स्थली है। यहीं मारूफगंज की बड़ी देवीजी का सिद्धासन है तो बड़ी और छोटी पटनदेवीजी भी यहीं विराजमान हैं। दक्षिण मे जल्ला के महावीरजी विराज रहे हैं तो अगम कुआँ का अलग महात्म्य है। और, उत्तर में जीवनदायनी वेगवती गंगा की धारा प्रवहमान् है। लोग श्रद्धावान् हैं, स्नेही हैं और परम आत्मीय भी हैं।

पटनासिटी कलावंतों, रससिद्धों, रसज्ञों-रसिकों, सेठ-साहूकारों की नगरी रही है। कालांतर में सुरों के साधकों, धुरंधर वादकों और ठुमरी-दादरा, टप्पा-तानों की मशहूर मलिकाओं ने इसी भूमि-भाग में अपना आशियाना बनाया। सुरों की रंगीन और हसीन महफ़िलें सजने लगीं यहाँ! राग-रागनियाँ इन्हीं आशियानों में महफ़ूज़ रहीं। बाल्यकाल में मैंने स्वयं अपनी आँखों देखे हैं उन आशियानों की बदहाली के दिन, जहाँ से उठती थीं कभी सम्मोहक और मारक तानें...! अपने ज़माने के जाने कितने हुनरमंद फ़नकार और अज़ीमुश्शान शानो-शौकत की फ़िरदौसों ने इसी ज़मीन से उठकर शोहरत की बुलंदियों को छुआ और यहीं ज़मींदोज़ हो गयीं। जाने कितने कलावंतों की चिताएँ यहीं जलीं और ठंडी हुईं।

यहाँ सबकुछ था--आध्यात्मिकता, कलानुराग, विरासतों को सँजोये रखने की तड़प और आपसी भाईचारा, प्रेम-सौहार्द, पहलवानी के अखाड़े और गली-चौबारों की रौनक; कमी थी तो साहित्यिक संस्कारों की, साहित्यानुरागियों की, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं की। बिहार तो वैसे भी पत्र-पत्रिकाओं के मामले में मरुभूमि-समान था। प्रख्यात शायर शाद अज़ीमाबादी (1846-1927) ने अपने युग में उर्दू अदब की शमा यहाँ खूब रोशन की, लेकिन हिन्दी साहित्य के सर्वाधिक पाठक बिहार में होने के बाद भी यह भूमि-भाग साहित्यिक रूप से सचेतन नहीं हुआ था। बीसवीं शती के तीसरे दशक में मेरे पूज्य पिताजी ने अपने ऋषिकल्प विद्वान् पितृश्री (साहित्याचार्य पं. चन्द्रशेखर शास्त्री) के निधन (1934) के बाद उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर को छोड़कर यहीं मालसलामी में बसना पसंद किया।

पिताजी ने अपने प्रयत्नों से यहीं से साप्ताहिक 'बिजली' नाम की एक साहित्यिक पत्रिका का संपादन-प्रकाशन, बर्मन एण्ड कंपनी के सहयोग से, 1936 ई. में आरम्भ किया। उन्होंने पटना के केन्द्र में अपने घनिष्ठ मित्र जनार्दन सहाय (कालान्तर में जिनके अनुज डाॅ. जितेन्द्र सहाय सुप्रसिद्ध नाटककार, व्यंग्यकार और संस्मरणकार बने) के साथ मिलकर साहित्यिक विमर्श की एक संस्था 'मेघमण्डल' की स्थापना की, जहाँ साहित्यानुरागियों की मण्डली जुटने लगी। दो वर्षों के प्रकाशन-काल में इस पत्रिका ने स्तरीय साहित्य के पठन-पाठन का ऐसा माहौल बनाया कि यह बंजर भूमि उर्वरा होने लगी। बिहार के निविड़ अंधकारमय साहित्याकाश में 'बिजली' ऐसी चमकी कि दिशाएं प्रकम्पित हुईं और आकाश उज्ज्वल प्रकाश से आलोकित हो उठा था। 'बिजली' ने स्थापित और सिद्ध साहित्यकारों की रचनाओं को स्थान दिया तो उदीयमान तथा नवोदित प्रतिभाओं को भी एक मंच प्रदान किया। एक ओर जहाँ महादेवी, निराला, पंत , प्रसाद, मैथिलीशरण, सियाराम शरण की रचनाएँ बिजली में छपीं, वहीं कवि बच्चन, नलिनविलोचन शर्मा, गोपालसिंह 'नेपाली', जनार्दन प्रसाद झा 'द्विज', हरेन्द्रदेव नारायण की लेखनी भी 'आरती' की आभा में चमक रही थी।...



प्रायः दो वर्षों के निरंतर प्रकाशन के बाद व्यावसायिक कारणों से 'बिजली' पद्मा, हजारीबाग में कड़कने चली गयी। पिताजी भी पद्मा गये और वहाँ के राजभवन में अतिथि बनकर रहे। उसी प्रवास में कई स्तरीय रचनाएँ उनकी कलम से कागज पर उतरीं। बिजली के खम्भे से बँधी गाय जब अपनी बछिया से बिछड़ गयी तो वह रात-भर आर्त्तनाद करती रही और खम्भे को उखाड़ फेंकने का संघर्ष करती रही। लेखक अपने घर के वातायन से उसका विलाप और संघर्ष देखते और मर्माहत होते रहे। दूसरे दिन सुबह के हल्के प्रकाश में विकल-विह्वल बाछी कुलाँचे भरती अपनी माँ के थन से आ लगी, इस दृश्य का मार्मिक और विचलित कर देनेवाला करुण विवरण जब उनकी लेखनी से कागज पर चित्रित हुआ और 'बिजली' में प्रकाशित हुआ तो हलचल मची थी। उसे पढ़कर टीकमगढ़ से पं. बनारसीदास चतुर्वेदीजी ने लिखा था--"आपकी कलम से गाय और बाछी की मनोवेदना, विकलता और विह्वलता साकार हो उठी है तथा पाठकों के मन को मथ देती है। ऐसी अन्य अनेक रचनाएँ हिन्दी में आनी चाहिए।"... किन्तु, आदेश से ऐसी रचनाएँ रूपायित नहीं होतीं। वैसी अनूठी मर्मवेधी रचना हिन्दी में दूसरी न आ सकी।...
[क्रमशः]

2 टिप्‍पणियां:

Meena Sharma ने कहा…

अति उत्सुक हूँ आलेख को आगे पढ़ने के लिए...
सादर ।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (20-11-2017) को "खिजां की ये जबर्दस्ती" (चर्चा अंक 2793) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'